Thursday, 17 May 2018

भारत की चिकित्सा सेवाओं में सरकार की असफलता।


-डॉ. नीरज मील 'नि:शब्द'
देश के इलेक्ट्रोनिक और प्रिंट मिडिया पर एक स्लोगन देखने को मिलता है ‘नो नेगेटिव न्यूज’ का। लेकिन फिर भी वे खबरें छपती है और प्रसारित भी होती हैं। वैसे तो ख़बर तो ख़बर होती है, वो छपनी ही चाहिए और प्रसारित भी होनी चाहिए। लेकिन अमानवीय ख़बरों का भी बोलबाला कम नहीं है। प्रतिदिन अखबार हो या टेलीविजन हम अमानवीय ख़बरों से रूबरू होते ही हैं। मानवीय संवेदनाओं का क्षरण होना किसी भी समाज या देश के लिए घातक ही होता है। और दुर्भाग्य से भारत में भी ऐसा हो रहा है। मिलावट और नकलीपन से बाज़ार भरा पड़ा है। हर चीज में मिलावट सामन्य बात है चाहे वह खाद्य हो या अखाद्य। दुग्ध और दुग्ध पदार्थों में बड़े स्तर पर मिलावट आम हो चुकी है। नकली दवाइयां सामानांतर व्यापार कर रही हैं। सरकार द्वारा संचालित स्वास्थ्य क्षेत्र तो खुद ही बीमार है।

     इंडिया में संगठित स्तर से लूट आम जारी है। मुख्यत: देश में दो क्षेत्र ऐसे हैं जहां लूट का धंधा अपने आप को पूर्णत: स्थापित कर चुका है। पहला है चिकित्सा और दूसरा है शिक्षा। आज का ये आलेख चिकित्सा के क्षेत्र में व्याप्त लूट पर आधारित है। चिकित्सा को वैसे तो सेवा का क्षेत्र माना गया है लेकिन कालान्तर में यह अपने आप को पूर्णत: व्यवसाय बना चुका है और लूट बदस्तूर दिन दूनी रात चौगुनी हो रही है। स्वास्थ्य और चिकित्सा एक अत्यावश्यक अनिवार्य जरूरत है। यह लोक कल्याण से सीधे तौर पर जुडी हुई है। इसी वजह से सरकार निजी क्षेत्र को भी हरसंभव सहायता देती है। यह सहायता विभिन्न रूपों में केंद्र एवं राज्य दोनों ही सरकारों द्वारा प्रदान की जाती है। देश की राजधानी दिल्ली जैसे शहरों में भी सस्ते भाव में जमीने अस्पतालों को दी हुई हैं। देश के अन्य शहरों और स्थानों पर भी इसी तरह निजी अस्पतालों को जमीने आवंटित की जाती हैं। जमीनों के अतिरिक्त भी सरकार द्वारा इन निजी अस्पतालों को नाना प्रकार की सब्सिडी भी दी जाती हैं। सरकार ऐसा इसलिए करती है ताकि ये अस्पताल भी सरकार का लोककल्याण में सहयोग कर सकें। गरीबों की मुफ्त में चिकित्सकीय सेवाएं दे लेकिन हकीकत में यही अस्पताल गरीबों को जिंदा लाश में तब्दील कर देते हैं। इनका दुस्साहस तो देखिये इन्होने तो अदालतों में मुफ्त की परिभाषाओं को चुनौती दे रखी हैं। इसी के चलते कुछ अस्पताल केवल चिकित्सक की फीस और बेड ही मुफ्त में देकर एहसान कर डालते हैं।
     हर एक चीज की हद हो सकती है लेकिन निजी अस्पतालों में हो रही लूट की कोई हद नहीं होती। इनकी लूट भी अनलिमिटेड है तभी एक सामान्य बीमारी को जानलेवा बताकर उपचार का बिल भी लाखों में थमा देते हैं। और सेवाओं का तो ज़िक्र ही क्या करें! लापरवाही बरतना, जीवित को मृत बताना और मृत को जिंदा बताकर इलाज के लिए लूटना आम बात हो रही है। क्या ये क्रूर मानसिकता का उदाहरण नहीं है? ऐसे निजी अस्पतालों में दाखिल होना ही आत्महत्या करने के समान है। यहां प्रवेश करते ही सबसे पहले मरीज को गुमराह किया जाता है। फिर बेवजह और बिना किसी जरुरत के केवल बिल बड़ा करने के लिए महँगी जांच करवाना, अस्पताल में भर्ती करना और फिर दवाइयों को सिलसिला एक अच्छे खासे पैसे वाले को कंगाल बनाने के लिए काफी है। और एक सामन्य आदमी को दिवालिया बना देता है ऐसे में गरीब की तो बात ही क्या करें! स्पष्ट है कि स्थिति भयावह तो है साथ ही गंभीर और क्रूर भी। निजी अस्पतालों में ने केवल बेदर्दी से लूटा जा रहा है बल्कि लापरवाही की वजह से असामयिक मौत भी बांटी जा रही है। समय आ गया है कि इनका इलाज़ किया जाएँ न कि इनके विरुद्ध कानूनी नोटिस भेजे जाएँ। कानूनी नोटिस से कुछ नहीं होने वाला है क्योंकि हजारों मामले पहले से ही विभिन्न न्यायालयों में लंबित हैं।
     सबसे बड़ा सवाल यही है कि पैसों के लिए चीरफाड़ करने वाले इन बेपरवाह और बेदर्द अस्पतालों को ठीक करने का क्या तरीका हो? सरकार भी बेबस ही नज़र आ रही है। लेकिन ऐसे में अब मरीज़ जाए तो कहाँ जाए ? किसे सुनाये अपनी आपबीती? क्यों उन मरीजों की चीखे किसी को भी नहीं सुनाई दे रही हैं जो बार-बार, हर बार यही पुकार रही हैं कि कोई तो सुन लो हमारी भी। लेकिन अफ़सोस आदमी एक दिन खुद उनके जैसा बना दिया जाता है फिर भी ये आवाज़ अनसुनी ही हो जाती है। हर एक चिकित्सा मद कमीशन आधारित हो गयी है। एक चिकित्सक द्वारा लिखी गयी दवा पर कमीशन, जांच पर कमीशन, रैफर पर कमीशन, एम्बुलैंस पर कमीशन, एक्सरे पर कमीशन, हर एक चीज बीना कमीशन नहीं है। दूसरा एक चिकित्सक बनने के लिए जो मारामारी है उसमे इतने पैसे खर्च हो जाते हैं उनको कमाना भी एक चिकित्सक का लक्ष्य बन जाता है। इस लिहाज़ से कैसे कह दे कि अब ये क्षेत्र सेवा का है?
     कैनथ एको जो कि अमेरिका के महान नोबेल अर्थशास्त्री थे और 1963 में चेतावनी दी थी कि स्वास्थ्य सेवा को किसी भी तरह से बाज़ार के हवाले करने से रोकना चाहिए अन्यथा इसके गंभीर और घातक परिणाम होंगे। बेशक इस चेतावनी को दुनिया के तमाम देशों ने गंभीरता से लिया हो लेकिन भारत में तो इसे धता बताकर स्वास्थ्य सेवाएं उद्योग में तब्दील हो गयी। और अब ये उद्योग अब नित नए और अनोखे परिणाम दे रहे हैं। ये नतीजे वास्तव में विभीत्स, शर्मनाक और अमानवीय हैं। निजी अस्पतालों चाहे वे दिल्ली में हो या देश की किसी अन्य शहर में, इनकी आने वाली खबरें वास्तव में पूरे देश को झकझोरने वाली हैं और इन ख़बरों से उजागर होने वाली लापरवाहियां और अमानवीयता झिंझोड़ने वाली हैं। लूट-खसोट के आंकड़े और सूचनाएं बड़ी भयावह हैं। भले ही मरीज को खतरा हो या न हो, अस्पताल के चिकित्सक उसे इतना आतंकित कर देते हैं कि वो घबरा जाता है और वो सब कुछ करने को बाध्य हो जाता है जो अस्पताल कहता है। सबसे ज्यादा असर गरीब या मध्यम वर्ग पर होता है इस लूट का। कई बार तो ऐसे केस भी सुनने में आतें हैं कि मरीज की मौत हो जाने के बाद भी चार-पांच दिन तक बिल बढ़ाने के उद्देश्य से उसे वेंटिलेटर पर ही लिटाये रखते हैं। कई बार जब मरीज़ उनकी नहीं सुनता है तो अस्पताल प्रबंधन इमोशनल ब्लैकमेल भी करता है। इस इमोशनल ब्लैकमेल में यहां तक कह देते है कि ‘लानत है ऐसे बेटे पर जो पैसे के लिए माँ को मारने सरकारी अस्पताल में ले जा रहा है।’ कई घटनाएं ऐसी भी होती हैं कि लाश की सपुर्दगी बिना बिल चुकाए नहीं की जाती। ये सब खबरें अब चौकाती नहीं है बल्कि रुलाती हैं। स्थिति ये है कि अगर केस बिगड़ता है तो ये सरकारी अस्पताल में भेज देते है।
     ऐसे में कुछ विचार इस तरह के भी प्रसारित होते हैं कि ‘आखिर गरीब निजी और महंगे अस्पतालों में जाते ही क्यों हैं?’ ये वास्तव में एक संवेदनशील मुद्दा है जो सीधा सरकार से सम्बंधित है। वास्तव में स्वास्थ्य, शिक्षा और जल की सीधी जवाबदेही सरकार की होती है लेकिन सरकार का लगातार उदासीनता बरतती है इन मामलों में। सरकार जानबूझकर ऐसे महंगे अस्पतालों पर सीधी कार्रवाई नहीं करती क्योंकि सरकार को देश की अफसरशाही चलाती है। यह सत्य नहीं है की सरकार अफसरशाही को सहायक के रूप काम में लेती है बल्कि ऐसे मामलों में अफसरशाही जो चाहती है सरकारे वही करती हैं। इन महंगे अस्पतालों में उच्च किस्म का इलाज़ सरकार के ऊंचे अफसरों को मुफ्त में मिलता है। ऐसे में इन महंगे अस्पतालों पर सीधी कार्रवाई कौन करे?
     सवाल ये उठता है कि सरकार क्या करे? तो आप आंकड़ों की तरफ देखे और तय करें कि सरकार ने किया क्या? देश में लगभग कुल 1 लाख 488 चिकित्सालय हैं लेकिन अफ़सोस इनमें सरकारी अस्पतालों की संख्या मात्र 19 हज़ार 817 ही है, जो कुल अस्पतालों का 20 फीसदी भी नहीं है। ऐसे ही चिकित्सकों की बात की जाए दो देश में अंग्रेजी पद्धति के कुल 10 लाख 22 हजार 859 है जिनमे महज 1 लाख 13 हजार 328 चिकित्सक ही सरकारी चिकित्सालयों में हैं। अब इलाज़ महंगा नहीं होगा तो और क्या होगा? अगर चिकित्सक और जनता का अनुपात देखा जाए तो सवा अरब आबादी के लिए केवल सवा दस लाख चिकित्सक की उपलब्धता है। अर्थात 1222 लोगों पर 1  चिकित्सक है, यह स्थिति बड़ी ही भयानक है। स्पष्ट है कि सरकार ने जानबूझकर और आराम से चिकित्सा सेवाओं का निजीकरण होने दिया है। अस्पताल ब्रांड बन रहे हैं और आम आदमी को निचोड़ा जा रहा है। यह एक ऐसी सेवा है जो कभी भी टाली नहीं जा सकती। इस तरह से निजीकरण करके देश की जनता को मजबूर किया जा रहा है कि भले ही वे अपना सब कुछ लुटा दे लेकिन इलाज़ तो निजी और महंगे अस्पतालों से ही करवाना पड़ेगा, और हां इलाज़ हो जाए इसकी कोई गारंटी नहीं है। सरकार चिकित्सा सेवाएं मुहैया करवाने में असफल तो है ही साथ ही इन सेवाओं के प्रति अपनी जवाबदेही भी भूल चुकी है। जनता का स्वास्थ्य परिस्थितियों के हवाले हो चूका है.... जय हिन्द।
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