Sunday, 20 May 2018

क्यों कांग्रेस को अब शीर्ष नेतृत्व बदलना चाहिए?


-डॉ. नीरज मील



आखिरकार राजनीतिक चालों की उठापटक के बीच कर्नाटक में भाजपा के बीएस येदियुरप्पा ने मुख्यमंत्री पद की शपथ 17 मई 2018 को सुबह 9 बजे ले ही ली। राज्यपाल महोदय ने भी नमक का हक अदा करते हुए भारतीय जनता पार्टी को 15 दिन का समय भी मुकर्रर कर दिया लेकिन भारत में न्याय का सर्वोच्च स्थान माने जाने वाले देश के सर्वोच्च न्यायालय इसे असंवैधानिक मानते हुए केवल 2 दिन अर्थात् आज यानी 19 मई को शाम 4 बजे तक बहुमत सिद्ध करने का आदेश भी 12 घंटे के भीतर ही दे डाला। माना कि 15 दिन का समय देना सही नहीं था लेकिन माननीय उच्च न्यायालय के इस आदेश से या भी तो सिद्ध हुआ कि राज्यपाल महोदय ने भाजपा को सरकार बनाने का न्यौता संवैधानिक तरीके से दिया है। ऐसे में प्रश्न ये नहीं है कि सरकार कोंग्रेस बना पाएगी या नहीं बल्कि ये होना चाहिए कि कर्नाटक में सिद्धारमैया जैसे ईमानदार नेतृत्व को भी जनता ने क्यों नकार दिया? क्यों भारतीय जनता पार्टी को कम मत प्रतिशत मिलने के बावजूद बहुमत के करीब सीटे मिल गयी? क्यों भाजपा मजबूत कोंग्रेस के कर्नाटक किले में भेदने में  सक्षम रही? क्यों कोंग्रेस को अपनी पूरी ताकत झोकने के बावजूद महज 78 सीटें ही मिल पाई? ऐसे ही हजारों सवाल हैं कांग्रेस कार्यकर्ताओं और प्रसंशकों के मन में। लेकिन फिर सबसे बड़ा सवाल जनता का है कि ‘क्या कांग्रेस पार्टी इस हार के असली कारण को जानने का प्रयास करेगी? कि कोंग्रेस को वापसी के लिए अपने शीर्ष नेतृत्व में क्या बदलाव करना है?
कांग्रेस के लिए शीर्ष नेतृत्व इसलिए बदलना जरुरी हो गया है क्योंकि जनता अच्छा कार्य करने के बावजूद भी कांग्रेस को नकार रही है। इसका ताज़ा उदाहरण के रूप में कर्नाटक को पेश किया जा सकता है। कांग्रेस में अधिकारिक तौर पर लेकिन चुपके से यह माना जा रहा है कि कर्नाटक में भी असम की तरह ही समय के साथ पनपी एंटी इनकंबेंसी की भावना ही सरकार को ले डूबी। जबकि हकीकत में विश्लेषण करें तो हार का एक ही कारण नज़र आता है और वह है कांग्रेस का कमजोर और बकवास केंद्रीय नेतृत्व। पूरे चुनाव प्रचार अभियान के दौरान सोनिया गांधी हो या राहुल गांधी या फिर अशोक गहलोत या अन्य को देखकर ऐसा लगा मानो कांग्रेस में जनता को रिझाने वाले नेता तो शायद बचा ही नहीं। प्रचार के दौरान कांग्रेस के केन्द्रीय नेतृत्व की स्थिति केवल केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार को कोसते नजर आए। भाजपा को सांप्रदायिक बताने के अलावा अपने पक्ष में वह जनता को कुछ भी नहीं बता पाए। यह भी नहीं बता पाए कि सिद्धारमैया कितने ईमानदार और काबिल व्यक्तित्व हैं। राहुल गाँधी सहित सभी केन्द्रीय नेताओं की स्थिति एक जैसी ही थी। वे राज्य सरकार की उपलब्धियां भी नहीं बता पाएं(या शायद उन्हें पता भी नहीं) कि राज्य में  सिद्धारमैया सरकार कितना विकास किया। खुद कांग्रेसी मानते हैं कि हमारा प्रचार हमारी उपलब्धियां बताने में नाकाम रहा। अब पार्टी हारी तो कारण भी साफ नजर आने लगे हैं।
कर्नाटक से पहले यही हाल कांग्रेस पार्टी का 2016 में असम में था। जहां 15 सालों से लगातार कांग्रेस पार्टी ही शासन कर रही थी। इतने लंबे समय से कोई भी सभी को संतुष्ट कर सके ये संभव नहीं था। फिर भी मुख्यमंत्री तरुण गोगोई ने वहां खूब काम किया, उग्रवाद से निपटे, विकास भी हुआ। चाय बागानों में शांति का माहौल कायम हुआ। मारवाड़ी समुदाय के खिलाफ पिछले कई वर्षों से से हिंसा की कोई बड़ी वारदात भी तरुण गोगोई के कार्यकाल में सामने नहीं आई है। इसके अलावा और भी बहुत कुछ तरुण गोगोई सरकार ने वहां किया। लेकिन कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व के पास एक भी उपलब्धि गिनाने को नहीं थी। कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व केवल केंद्र को कोसता ही रहा। स्पष्ट है कि मौजूदा समय में कांग्रेस असमन्वित और गैर तारतम्यता वाली पार्टी है।
कांग्रेस को ये स्पष्ट कर ही लेना चाहिए कि उसकी हार का धार्मिकता से कोई ताल्लुक नहीं है। उसकी हार का मुख्य कारण है शीर्ष नेतृत्व में आम जन की दिलचस्पी न होना है। हाल ही में संपन्न हुए कर्नाटक चुनाव इसके उदाहरण हैं जिसमें जनता ने स्पष्ट रूप से बहुमत किसी भी पार्टी को नहीं दिया है। इस चुनाव से पहले के चुनावों का विश्लेषण भी यही कहता है। कर्नाटक चुनाव के बाद कांग्रेस की स्थिति और भी विचित्र हो गयी है। कांग्रेस के भीतर इन परिणामों के बाद नेता मुखर होने लगे हैं और नेतृत्व में परिवर्तन की मांग की जाने लगी है शशि थरूर ज्योतिरादित्य सिंधिया दिग्विजय सिंह तो 2016 से ही दबी जुबान से यह मुद्दा उठा रहे हैं हालांकि उनके विचारों को तरजीह कितनी मिली, कहना मुश्किल है। कालान्तर में सोशल मीडिया सहित सभी मंचों से प्रति यह आम धारणा बनायीं जा चुकी है कि कांग्रेस का राजनीतिक केंद्र बिंदु में मजहब के नाम पर मुसलमानों को एकजुट करना और जाति के आधार पर हिंदुओं को बांटना है। कांग्रेस द्वारा इसका दोहन आज़ादी के बाद से लगातार किया जा रहा है। कांग्रेस द्वारा हाल ही में कर्नाटक में लिंगायत और वीरशैव लिंगायत को धार्मिक अल्पसंख्यक गैर हिंदू का दर्जा देने की अनुशंसा को इसके  उदाहरण के रूप में पेश किया जा रहा है।
     कर्नाटक चुनावों के नतीजों से निकले निष्कर्ष से 5 बातें स्पष्ट है। पहली और महत्वपूर्ण कोंग्रेस के दृष्टिकोण से कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी अब भी राजनीतिक के कच्चे खिलाड़ी हैं। दूसरी, कांग्रेस में नीतिगत मामलों में स्पष्ट दृष्टि का नितांत अभाव है, जैसे अशोक गहलोत जैसे नाकाबिलों को भी तवज्जो मिलना। तीसरी, जनता का विश्वास नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह से अभी भी अटूट बना हुआ है। चौथी, जनादेश विशुद्ध रूप से कांग्रेस के खिलाफ हैं। जिसे कोंग्रेस शालीनता के साथ स्वीकार करने के स्थान पर जनता दल सेकुलर के साथ मिलकर इस जनादेश को हड़पने का प्रयास कर रही है। कांग्रेस को ऐसा करने देना लोकतंत्र और संवैधानिक परंपराओं का अपमान होगा। और पांचवी व अंतिम, कोंग्रेस के शीर्ष नेतृत्व में वक्त के तकाजे से राहुल गाँधी तक को राजनीति से संन्यास ले लेना चाहिए। राजस्थान से बुलाए गए चाटुकार अशोक गहलोत को अनिवार्य रूप से कांग्रेस से दूर ही रखना चाहिए।
     2014 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस के मुकाबले भाजपा को कर्नाटक में महज 2.2 फीसदी अधिक मिले थे जो इस बात का पुरजोर समर्थन करता है कि आमजन में भाजपा की क्या लहर थी हालांकि सीटों के हिसाब से भाजपा ही आगे रही। स्पष्ट है कि कांग्रेस की वोट हिस्सेदारी विस्तृत है और भाजपा की मुकाबले में कमतर ही दिखती है। देश के छोटे मोटे सभी राजनैतिक दल इस बात पर विचार जरुर कर रहे हैं कि भाजपा को कैसे रोका जाए? आवश्यकता सभी पार्टियों को आपसी मतभेद भूलाकर एक नयी शुरुआत करने की है। इसकी शुरुआत कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व एवं थिंक टैंक को करनी होगी। रणनीति सर्वप्रथम 2015 में बिहार के चुनाव के दौरान प्रमाणित हो चुकी है। जब राष्ट्रीय जनता दल जनता दल यूनाइटेड तथा कांग्रेस के महागठबंधन में भाजपा को बुरी तरह हराया था।
     कांग्रेस को भारतीय राजनीति में अगर अपना अस्तित्व बचाना है तो अपनी रीति-नीति और शीर्ष नेतृत्व में आमूल-चूल बदलाव लाना ही होगा। पार्टी के कार्यकर्ता अब सम्मान चाहते हैं। अपनी हर बात पर गौर करवाना चाहते हैं। अपने सिपहसालारों की सलाह पर चलने वाले राहुल गांधी को या तो आम कार्यकर्ता बनकर राजनीती सिखानी चाहिए या फिर राजनीती से सन्यास ही ले लेना चाहिए। पार्टी के थिंक टैंकों को चाहिए कि देश के विभिन्न राज्यों से  बुलाए गए अशोक गहलोत जैसे चाटुकारों से पार्टी को बचाते हुए उन्हें अनिवार्य रूप से कांग्रेस से दूर कर देना ही उचित होगा। प्रियंका गांधी को भी आगे लाकर परिवारवाद को आगे बढ़ाने की गलती से तौबा करना चाहिए। जनता और कार्यकर्ता में विश्वास तभी जागेगा जब निचले स्तर तक पार्टी कार्य करेगी। पार्टी  के थिंक टैंक को पार्टी बचाने के लिए हर स्तर पर मेहनत करनी होगी। एक व्यक्ति की जगह सर्व जन पार्टी के सिद्धांत पर चलना होगा। इस देश में कोई भी कांग्रेसी समर्थक कभी नहीं चाहेगा कि एक सदी से ज्यादा पुरानी और साठ  साल देश की बागडोर संभालने वाली पार्टी यूं ही अपने एक परिवार के सदस्यों के खातिर डूब जाएं। सनद रहे कि इस पार्टी से ही देश ने आज़ादी की लड़ाई का सफर तय किया था और इसी पार्टी से आज़ाद भारत को आगे भी बढाया था। देखते हैं कि भविष्य क्या गुल खिलाता है? बाकि वक्त ने साबित भी कर दिया है कि राहुल गांधी कांग्रेस क्या किसी भी पार्टी के अध्यक्ष होने लायक नहीं है।.....इंक़लाब जिंदाबाद!
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