Thursday, 17 May 2018

छप्पन इंच से गुलामी की ओर बढती लाचारी...!


डॉ. नीरज मील
dr.neerajmeel@gmail.com
    
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विविधता में एकता की मिसालें भारत में काफी दी जाती रही हैं। लेकिन ये कैसा देश है यह तय कर पाना हर किसी के लिए अब टेढ़ी खीर ही साबित हो रहा है। हाल ही में देश में कर्नाटक चुनाव चर्चित विषय रहा है। कर्नाटक चुनावों के तुरंत बाद दो घटनाएं घटित हुई है जिन्होंने देश को एक बार फिर झकझोर कर रख दिया है। लेकिन बावजूद इसके हर कलम खामोश है, कोई प्राइम टाइम नहीं है, कोई न्यूज रूम संवेदना तक प्रकट नहीं कर रहा है।
   पहली घटना वारणसी में एक निर्माणाधीन पुल के गिरने से 20 लोगों की मौत की है। जो वाकई न केवल चिंता का विषय बल्कि विषादभरी और हृदय विदारक भी है। यह घटना हमेशा की भांति कुछ सवाल लेकर विदा हो जाएगी और लोग भूल भी जायेंगे। इसी प्रकृति की एक घटना जब पश्चिम बंगाल में हुई थी तब देश में भूचाल सा आ गया था। देश की राजनीती ने इसे खूब भुनाने की कोशिश की थी। वर्तमान प्रधानमंत्री ने भी चुनावी सभा में इस मुद्दे को खूब अच्छी तरह से पेश किया था लेकिन उसी तरह की दुर्घटना अपने संसदीय क्षेत्र में घटित हो जाने के बावजूद चुप हैं। हां इसी बीच कल केंद्र सरकार ने एक बड़ा फैसला लेते हुए सुरक्षा बलों से कहा कि ‘वे रमजान के पाक महीने में जम्मू-कश्मीर में कोई अभियान नहीं चलाएं।’ ये फैसला वास्तव में समझ से बाहर की प्रकृति वाला है। क्या देश को इस फैसले से फायदा होगा या गंभीर नुकसान ये तो वक्त ही बतायेगा। न तो जम्मू कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती के एकतरफा संघर्ष विराम की मांग पर लिया गया ये फैसला राष्ट्र हित में नहीं है न पथराव करने वालों पर राज्य व केंद्र सरकार की नरम नीति।
    जम्मू-कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती की एकतरफा संघर्ष- विराम की बात पर भाजपा की प्रदेश इकाई के प्रवक्ता सुनिल सेठी और अरुण गुप्ता ने एक संवाददाता सम्मेलन में कहा कि ‘मुख्यमंत्री ने जिस एकतरफा संघर्ष विराम का सुझाव दिया है वह सिर्फ आतंकवादियों पर दबाव कम करेगा और उनमें (आतंकियों में) नया जोश भरने का काम करेगा।’ बावजूद इसके केंद्र सरकार ने ये फैसला ले लिया। वास्तव में ये फैसला सरकार का सता के लिए पीछे खिसकने वाला फैसला है। जम्मू-कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती की कारवाई न करने की मांग और उसे केंद्र में भाजपा सरकार द्वारा मान लेना वास्तव में आतंकवाद का धर्म तय करने वाला कदम ही है। स्पष्ट है कि जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद और आतंकवादी का धर्म क्या है।
    इससे पहले भी भाजपा के ही प्रवक्ता ने कश्मीर घाटी में हालात को बहुत गंभीर बताया और कहा कि महबूबा मुफ्ती सरकार की नरम नीति इसके लिए जिम्मेदार है। उन्होंने कहा, ‘सुरक्षा हालात बहुत गंभीर हैं,कश्मीर में पथराव जारी है और दुर्भाग्य से एक पर्यटक की जान चली गई है। हकीकत यही है कि सुरक्षा बालों की ताबड़तोड़ कार्रवाई में आतंकवाद के पुजारी रोजाना बड़े पैमाने पर हताहत हो रहे थे और वे लोग दबाव में भी थे। लिहाज़ा जम्मू-कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती की एकतरफा संघर्ष- विराम की जम्मू-कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती की एकतरफा संघर्ष- विराम की मांग आतंकवादियों के पस्त होते हौसलों को डूबते को तिनके का सहारा है जिस पर केंद्र सरकार द्वारा पुख्ता मुहर लगा दी। वास्तविकता भी यही है एकतरफा संघर्ष विराम आतंकवादियों पर पड़े दबाव को न केवल कम करेगा बल्कि उन्हें फिर से उत्साहित करेगा और उन्हें आराम देने वाला साबित होगा।
केंद्र के इस फैसले से सबसे ज्यादा खुश तो जम्मू-कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती और विपक्षी पार्टी नेशनल कांफ्रेंस दोनों के नेता हैं। विपक्षी पार्टी नेशनल कांफ्रेंस उमर अब्दूल्ला ने आज केंद्र सरकार के रमजान के पवित्र महीने के दौरान जम्मू-कश्मीर में सैन्य अभियान नहीं चलाने के फैसले का स्वागत किया है। वहीँ केंद्र सरकार की घोषणा के बाद मुख्यमंत्री महबूबा ने भी एक ट्वीट में कहा, ''मैं दिल से रमजान में संघर्षविराम का स्वागत करती हूं और नरेंद्र मोदी तथा राजनाथ सिंह जी का उनके निजी हस्तक्षेप के लिए धन्यवाद देती हूं। मैं उन सभी पार्टियों और नेताओं की भी आभारी हूं जिन्होंने सर्वदलीय बैठक में हिस्सा लेकर इस सामंजस्य तक पहुंचने में मदद की।’’ उन्होंने कहा कि रमजान शांति का अग्रदूत है और इस तरह का फैसला दीर्घकालीन वार्ता के लिए शांति बहाल करने और सौहार्दपूर्ण माहौल तैयार करने में भूमिका निभाएगा। यहां एक बहुत बड़ा विश्वस्तरीय प्रश्न खड़ा होता कि अगर रमजान शांति का अग्रदूत है तो फिर अधिकतर आतंकवादी इस्लाम को मानने वाले ही क्यों होते हैं? स्पष्ट है कि इस्लाम की पेचिदियों और इस्लाम के अनुयायियों को मजहब के नाम पर बरगलाया जाता है और ज़ेहाद जैसे वहियाती अल्फजों में उलझाकर आतंक फैलाने की एक बहुत बड़ी राजनीति है जो कमोबेश विश्व के हर कोने में चलती है। ऐसा नहीं है कि ये केवल इस्लाम में है बल्कि प्रतिक्रिया के सिद्धांत का फायदा उठाकर अन्य धर्मों के ठेकेदारों द्वारा भी बड़े स्तर पर बरगलाया जाता है।     यहां विपक्षी दल के नेता उमर अब्दुल्ला उस बयान का ज़िक्र करना जरुरी है जिसमें उन्होंने कहा कि “रमजान के दौरान सैन्य अभियान पर रोक लगाने के केंद्र सरकार के फैसले का अगर आतंकवादी सकारात्मक तरह से जवाब नहीं देते हैं तो इससे पता चलेगा कि वह लोगों के दुश्मन हैं।” इसके अतिरिक्त उन्होंने एक ट्वीट में यह भी कहा कि, ''सभी राजनीतिक पार्टियों (भाजपा को छोड़कर, इस पार्टी ने इस मांग का विरोध किया था) की मांग पर केंद्र सरकार ने एकपक्षीय संघर्षविराम की घोषणा की। अगर आतंकवादी इस फैसले का सकारात्मक जवाब नहीं देते हैं तो इससे पता चलेगा कि वह लोगों के दुश्मन हैं। वास्तव में सरकार का ये फैसला आमजन की भावनाओं के अनुरूप हो सकता है लेकिन क्या आतंकवाद और आतंकवादियों के विरुद्ध चल रही देश की लड़ाई में अपेक्षित सहयोग वाला है? क्या देश हित में है? क्या सुरक्षाबलों की रणनीति को मध्यनजर रखते हुए किया गया है?
    भारतीय सुरक्षाबलों द्वारा पिछले एक महीने से जिस रणनीति से घाटी में सफाई अभियान ‘ऑपरेशन ऑलआउट’ चला रखा था वह वास्तव में एक उच्च क्षमता और रणनीति को दर्शाता है। सेना के इस अभियान ने कई मुख्य आतंकवादियों को मार गिराया है। इस वजह से दक्षिण कश्मीर में आतंकवादियों की कमर तोड़ दी। ऐसे में रमजान के दौरान इस कार्रवाई को स्थगित करने के फैसले से सेना और सुरक्षाबलों को आतंकवादियों के खिलाफ इस अभियान में बाधा ही साबित होगा। जानकार उक्त फैसले को सेना का मनोबल गिराने वाला करार दे रहे हैं। सही है किसी के पैर और हाथ बांधकर चलने को मजबूर करना ही साबित होगा। स्थानीय युवकों को आतंकी गुटों में भर्ती करने के बाद अब उन्हें कश्मीर में ही प्रशिक्षण दिया जा रहा है। रमजान के बहाने आतंकवादी अपनी योजनाओं को और सुदृढ़ बनाने में जुट जायेंगे। उनमें कार्रवाई का कोई खौफ नज़र नहीं आएगा। ऐसे में स्पष्ट है कि सरकार का ये फैसला उचित प्रतीत नहीं होता नज़र आ रहा है। ये फैसला एक तरह से आतंकवादियों को सहूलियत देने वाला ही नज़र आ रहा है और इस बात की आशंका से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि देश में अचानक से आतंक की घटनाएं बढ़ सकती है। सरकार के इस फैसले को सब ओर से आलोचनाओं का ही सामना करना पड़  रहा है। ऐसे में देश की सेना पर देशवासियों को उम्मीद ही नहीं बल्कि अटूट विश्वास है कि भारतीय सेना इन विपरीत परिस्थितियों में भी अपनी सूझबूझ का परिचय देते हुए देश और देश की जनता को महफूज़ रखने में कोई कसर नहीं छोड़ेगी। सरकार को भी चाहिए कि वो इस फैसले पर पुनर्विचार करे। आतंक और आतंकवादियों से कोई रहम का भाव नहीं रखना चाहिए। जब तक आतंकवादी आतंक फैलाएं तब तक सेना को फ्री हैण्ड ही देना उचित है। उम्मीद है कि ये फैसला सही साबित हो लेकिन अभी तो सत्ता के लिए लिया गया फैसला ही नजर आ रहा है। जो केंद्र की भाजपा सरकार को छप्पन इंच से गुलामी की ओर..... वाला ही साबित कर रहा है। जय हिन्द।
   
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