Thursday, 17 May 2018

लोकतंत्र में सरकार द्वारा शोषण की कहानी

-डॉ. नीरज मील
राजस्थान में बहुत से विभागों में सरकार द्वारा अल्प मानदेय पर संविदा पर कार्यरत युवाओं का एक बड़ा तबका है I जो इस आस में अपनी सेवाएं बदस्तूर जारी रखे हुए हैं कि कभी वह दिन भी आएगा जब हम भी स्थाई होंगे I ऐसा नहीं है कि संविदा पर कार्यरत लोग स्थाई नहीं होते I ऐसा भी नहीं है कि इन लोगों ने इस धारणा के साथ संविदा नौकरी ज्वाइन की थी कि सरकार देर-सवेर स्थाई कर ही देगी I  इनकी स्थायीकरण की आशा इसलिए जायज है जब सरकार ने इनको हर बार यानी कि कई बार चाहे वह चुनाव की वजह से हो या फिर राजनीतिक महत्वकांक्षा की वजह से सरकार ने इनमें यह धारणा घर कर दी थी I पूर्ववर्ती सरकार द्वारा जुलाई 2013 में 10,20 एवं 30 अंकों का बोनस देकर इनको सरकारी नौकरी अथवा स्थायीकरण का ख्वाब दिखाया गया I  लेकिन अफसोस और विडंबना यही रही कि आज दिनांक तक हजारों की तादाद में युवा भीड़ संविदा पर और अल्प मानदेय के लिए ही नौकरी कर रही हैI भाजपा की सुशासन का दावा करने वाली सरकार ने इन भर्तियों को एतद् रद्द कर दिया गया I वास्तव में देखा जाए तो यह सरकार द्वारा पोषित अथवा  सरकार द्वारा प्रायोजित एक शोषण की प्रक्रिया है जो हर राज्य में बड़े पैमाने पर जारी है I यही आर्थिक शोषण अगर कोई प्राइवेट क्षेत्र से करें तो सरकार उस पर अपना शिकंजा इस तरह से करती है जैसे एक कोतवाल चोर पर I लेकिन यहां शिकंजा कसने वाली भी सरकार है और शोषण करने वाली भी सरकार I  पूछने वाला कोई नहीं है लोकतंत्र में ऐसी जवाबदेही का नजारा बहुत बार देखने को मिलता है I अब एक आदमी अगर 10 साल से संविदा पर नौकरी कर रहा है तो इसमें उस व्यक्ति का क्या दोष है I शायद कुछ भी नहीं, एक बेरोजगार हमेशा एक रोजगार की तलाश में रहता है I उसे एक रोजगार की जरूरत होती है जो उसे एक काम दिला सके और काम के बदले सम्मानजनक मानदेय I  यह सही है कि जब संविदा में पैसे कम होते हैं तो लोग क्यों आते हैं? यह कहने को बड़ा ही सीधा और सरल सवाल हो सकता हैI  लेकिन एक बेरोजगार के पास इन सवालों का कोई औचित्य नहीं हैI सवाल तो और भी बहुत है लेकिन वे सवाल ही रह जाते हैं I  अगर इसकी तह तक जाएं उन संविदा कार्मिकों के दिल से इस प्रश्न का उत्तर जानने का प्रयास करें I हम देखेंगे या पाएंगे कि वास्तव में उनके साथ जो हो रहा है वह न केवल अन्यायपूर्ण है बल्कि बर्बरतापूर्ण भी है I
आज भाजपा के इस सुशासन के दौर में यह पीड़ित कार्मिक जो संविदा पर हैं उमने से राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के संविदा कार्मिक दूसर बार हड़ताल पर हैंI  इस बार हड़ताल वास्तव में अब तक की कार्मिकों के द्वारा की गई सबसे बड़ी हड़ताल रही है I  आंदोलन की अगर लंबाई की बात की जाए तो देश ने सबसे बड़ी लंबी लंबी लड़ाई आजादी के लिए लड़ी थी जो करीब सौ साल तक चलीI  हरियाणा में किसान आंदोलन 72 दिन चला, हरियाणा में ही एनआरएचएम आंदोलन 68 दिन चला I  राजस्थान में अध्यापक आंदोलन 1996  में 58 दिन के लगभग रहा I राजस्थान में ही ग्रामीण नर्स संविदा आंदोलन 2008  में 78 दिन तक चला और हाल ही में MP में एनआरएचएम कार्मिकों और अन्य संविदा कार्मिकों का संयुक्त आंदोलन लगभग 120 दिन चला I  राजस्थान में लेब तकनीशियनों  के संघ ने भी आंदोलन किया जो 45 दिन तक चलाI इसी तरह राजस्थान में नेत्र सहायको का आंदोलन भी 68 दिन तक चला I हालांकि चिकित्सकों के हाल में की गयी हड़ताल बेबुनियादी थी I   स्पष्ट है कि इतने लंबे रहे आन्दोलन सरकार की विफलता का प्रतीक है और इन आंदोलनों में सबसे बड़ी बात जो भरकर सामने आई है वह है कार्मिकों की लाचारी और सरकार की हठधर्मिता । एक विश्लेषण के तौर पर देखें तो एक व्यक्ति आंदोलन क्यों शुरू करता है जब उसे यह लगता है कि उसके साथ अन्याय या अनुचित हो रहा है I  एनआरएचएम कार्मिकों यह आन्दोलन सरकार द्वारा इनके स्थायीकरण को लेकर लगातार की गयी अनदेखी और इन्हें कम पारिश्रमिक पर कार्य करवाना मुख्य कारण रही है I  हालांकि 10 साल नौकरी करने के बाद एक कार्मिक या एक सामान्य आदमी हमेशा चाहेगा कि उसका भविष्य आर्थिक रूप से सुरक्षित हो और उसे नौकरी पर लटकने वाली तलवार की चिंता से मुक्ति मिले I  जब 10 साल तक आप सरकार को अल्प वेतन पर अपना अमूल्य समय एवं काम दे सकते हैं तो स्थायीकरण के लिए सरकार की भी निश्चित और नैतिक जिम्मेदारी भी बनती है I वह आपके बारे में सोचें और आपको सरकार की जो नीतियां हैं उनमें परिवर्तन करते हुए या उनमें तब्दीली करते हुए आपको एक उचित सम्मान दें I  निश्चित तौर पर स्थायी नौकरी जरूरत है अब कैसे दे, किस प्रकार दें? यह सरकार और इसके नीति निर्धारकों का न केवल नैतिक बल्कि संवैधानिक कर्तव्य भी है I  लेकिन यहां प्रश्न यह उठता है कि नीति-निर्धारकों जो बड़े अफसर हैं वहीं इस बात को तवज्जो नहीं दे रहे हैं I  यहां तक की इनके बारे में तो यह भी कहा जा रहा है कि इन की हड़ताल नाजायज है I  ठीक है मान लेते हैं कि नाजायज है तो फिर जायज क्या होगा ? क्या शोषण को सहन करना जायज है? जबकि हमारे संविधान में भी शोषण को सर्वदा अनुचित माना गया है I संविधान में स्पष्ट कहा गया है कि आप अपने अधिकारों के प्रति सचेत रहें और कर्तव्यों का निर्वहन करें I अगर इन एनआरएचएम में कार्यरत संविदाकार्मिकों और  सरकार के बीच हुए अनुबंध की बात की जाए तो भी हम पाएंगे कि वास्तव में इनके साथ जो अनुबंध हुआ है वह शुरू से ही व्यर्थ है I जब किसी भी पार्टी जो एक अनुबंध के अंतर्गत होती है उसे  प्राकृतिक सिद्धांत या प्राकृतिक न्याय जैसे कई सिद्धांतों का ध्यान रखना होता है I कानूनी भाषा में ‘यदि किसी ठहराव प्राकृतिक अधिकारों का शोषण होता है या फिर किसी पक्ष द्वारा ऐसा करने के लिए अनुचित रुप से दबाव डाला जाता है अथवा बाध्य किया जाता है तो वह अनुबंध अधिनियम की परिसीमा से बाहर की बात होती है और अनुबंध अधिनियम में स्पष्ट का उल्लेख है कि ऐसा प्रत्येक ठहराव जो राज नियम द्वारा परिवर्तनीय ना हो सके वह शुरू से ही व्यर्थ माना जाएगा और अनुबंध नहीं बन सकेगा I’  
एनआरएचएम में कार्यरत संविदाकार्मिकों ने राजस्थान को स्वास्थ्य कार्यकर्मों के बेहतर संचालन के लिए राष्ट्रीय स्तर पर कई बार गौरवान्वित किया हैI इसके बावजूद भी इन एनआरएचएम संविदा कार्मिकों की राजस्थान में सरकारी अन्याय और शोषण की कहानी बहुत लंबी है I  2007 में इन्हें जिस मानदेय पर रखा गया था आज भी 2 वेतन आयोग आ जाने के बाद भी मूल मानदेय वही हैI इनके अनुबंध को ही देखा जाए तो इनके अनुबंध में 10 फ़ीसदी का वार्षिक इजाफा करने की बात कही है लेकिन अध्ययन करने पर ज्ञात यह हुआ है कि उस वार्षिक अभिवृद्धि को भी सरकार द्वारा बिना इन कार्मिकों की सहमति के घटाकर 5% कर दी गयी है I अनुबंध को धता बताते हुए पूर्व निर्धारित एवं दिया गया यह इजाफा भी कार्मिकों से वसूला जा चूका है I अब जो फ़ीसदी का वार्षिक अभिवृद्धि है वह भी अभी तक लंबित है I  इस प्रकार अन्य जो चीजें हैं वह सारी गौण हैं I अब प्रश्न यह उठता है कि क्या रूपये 7000 मासिक में एक ऑपरेटर व रूपये 8000 मासिक में एक अकाउंटेंट अपना परिवार चला सकता है? क्या यह मानदेय न्यूनतम मजदूरी की शर्तों के अनुरूप है? क्या इन मानदेयों को किसी भी रूप से उचित नहीं माना जा सकता ? कुछ लोग इस आलेख को इनके प्रति सहानुभूति सहानुभूति पूर्वक लिखे गए लेख उपमा देंगे लेकिन मुझे खुशी होगी I  हां अगर किसी अन्याय के खिलाफ किसी लेखक की कलम चलती है तो लोकतंत्र और कलम के लिए यह सौभाग्य की बात होगी I
इन कार्मिकों द्वारा हाल में 26 फरवरी से की गयी हड़ताल आज 61 दिन भी राज्यभर में जारी है I मार्च 2018 को झुंझुनू में प्रधानमंत्री की के सामने मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे को काले झंडे दिखाकर भी विरोध प्रदर्शन भी किया गया I  लेकिन इन इस विरोध के प्रदर्शन से सरकार इनकी मांगों पर ध्यान देने के बजाय इन्हीं कार्मिकों पर मुकदमे लगाकर इनके आंदोलन को कुचलने का प्रयास किया है I  बेहतर होता कि सहानुभूतिपूर्वक सरकार द्वारा इनके स्थायीकरण की मांग पर ध्यान देते हुए कार्रवाई करती I अब जबकि सरकार के पास केवल और केवल चार-पांच महीने का कार्यकाल शेष रहा है ऐसे में भर्तियां तो नित रोज निकल रही हैं, कभी मंत्रालयिक बोर्ड की तरफ से तो कभी राजस्थान लोक सेवा आयोग की तरफ से I  लेकिन प्रश्न फिर भी खड़ा होता है कि एक व्यक्ति जो सरकार वजह से अपंग हुआ है क्या उसके प्रति सरकार की जिम्मेदारी नहीं बनती? क्या यह उचित है कि सरकार द्वारा एनआरएचएम कार्मिकों को काले झंडे दिखाने की वजह से स्थायीकरण वंचित रखा जाएगा ? क्या सरकार का यह रवैया वाकई लोकतांत्रिक है या फिर कुछ और?  खैर स्थिति जो भी हो इसके परिणाम क्या होंगे यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा लेकिन इतना तय है कि
जुल्म की इतनी इंतेहा भी मत कीजिए कि मजबूर हो जाए I  
अन्याय को इतना भी मत कीजिए कि वह नागवार हो जाए II

अब एनआरएचएम कार्मिकों क्या करें बेचारे नौकरी में आ गए वह संवैधानिक अधिकारों की बात नहीं कर सकते क्योंकि सर्विस कंडक्ट रूल लागू है लेकिन अफसोस इस बात का है कि सर्विस राइट्स लागू नहीं हैंI
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