Wednesday, 30 May 2018

धूमिल होती घोषणाएं : लोकतंत्र के लिए खतरा हैं?

डॉ. नीरज मील


दस्तूर, रिवाज, परंपरा, मान्यताएं यह सब कुछ भारत ही नहीं बल्कि संपूर्ण विश्व में किसी न किसी रूप में मानी जाती हैं। चुनावी माहौल में चुनाव के समय  या चुनाव प्रचार के दौरान नेताओं द्वारा किए गए वायदे, दलों द्वारा की गयी घोषणाएं और चुनाव के बाद उन घोषणाओं में से उपजे, उन वादों में पनपी विकृतियों आम बात है। चुनावी सभाओं के दौरान या चुनाव आचार संहिता से पहले प्रत्येक दल और नेता द्वारा तैयार एक विशिष्ट प्रकार की घोषणा या घोषणा पत्र वायदे के रूप में जनता जनता के सामने सजाकर रखे जाते हैं, ये वायदे निश्चित ही चुनाव के बाद टूट जाते हैं। 5 साल के दौरान इतने कायदे-वायदे टूटते हैं और सब घोषणाएं इस तरह से धूमिल हो जाती हैं कि वोटर्स ठगा महसूस करने लग जाता है। भारत में यह आजादी से लेकर अब तक होता आया है। जब तक इस सम्बन्ध में कोई विशेष समाधान या सुधार न हो तब तक ये सब होता रहेगा।
“चुनावी घोषणाएं कभी पूरी नहीं होती” या नेता और “पार्टियों के वादे हैं वादों का क्या” चुनावी घोषणाओं को लेकर इसी तरह की अवधारणाएं प्रचलित हो चली हैं। इन अवधारणाओं में स्थायित्व कायम हो चुका है। अब डर ये है कि कहीं ये आगे चलकर यह शायद एक विचारधारा का रूप न ले ले अन्यथा लोकतंत्र ही ख़त्म हो जाएगा। जो अवधारणाएं वर्तमान में लगभग स्थाई हो चुकी हैं, कोई नई बात नहीं है। देश की जनता अब अपने आप को इस भ्रम में डाल चुकी है कि हमें तो मतदान करना है, अर्थात दान करना है। हमें इससे कोई सरोकार नहीं है कि जिस दल को सरकार बनवाने के लिए पिछले चुनाव में हमने मत दिया था, क्या उस सरकार ने उस दल के रूप में की गई घोषणाओं में से किसी एक भी घोषणा को पूरा किया है या नहीं। अथवा अमल में लाया है या नहीं इस बात से कोई सरोकार है तो यहां यह महत्वपूर्ण हो जाता है कि क्या वास्तव में अब एक ऐसी आवश्यकता महसूस की जाने लगी है कि इन घोषणाओं और घोषणापत्रों के प्रति उत्तरदायित्व की भावना या एक जवाबदेही तय की जाए! वास्तव में देखा जाए तो जिस प्रकार थोक के भाव में जो घोषणाएं घोषणापत्र में व्याख्यांकित की जाती है या लिखी जाती हैं उनको देखते हुए और शासन की जवाबदेही की मांग को देखते हुए यह विचार प्रखर होता जा रहा है। और हो भी क्यों ना लोकतंत्र में ऐसे विचार की बड़ी ही कीमत होती है, लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि वर्तमान में संसद में बैठे हुए सांसद और देश की संसद इस संदर्भ में कोई फैसला लेगी या नहीं? अगर भूतकालीन प्रवृत्ति पर विचार किया जाए गौर किया जाए तो यही पाया जाएगा कि इस प्रकार की कोई फैसला यह संसद आज तक नहीं ले पाई है और शायद ही आगे ले पाए!
चुनावी घोषणा पत्र सुनने में नाम बड़ा ही जाना पहचाना लगता है लेकिन हमारे देश जिसको हम भारत कहते हैं के संदर्भ में देखा जाए तो इन चुनावी घोषणा पत्रों को सचमुच पढ़ता कौन है? यह कह पाना मुश्किल है लेकिन घोषणापत्र मतदाताओं को प्रभावित जरूर करते हैं। वह अखबारों व अन्य माध्यमों से राजनीतिक दलों के लिए वोट जुटाने में मदद जरुर करते हैं। यहां यह कहना बेमानी होगा की बौद्धिक या वैचारिक स्तर पर इनका कोई महत्व है। वर्तमान परिपेक्ष में एक आदर्श स्थिति के लिए तो घोषणापत्र राजनीतिक प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण हिस्सा होना ही चाहिए। लोकतंत्र में तो यह और भी ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि जमीनी स्तर पर यही बिंदु लोकतंत्र का परचम बुलंद करता है। लेकिन आजाद भारत के राजनीतिक इतिहास में शायद ही चुनावी घोषणा-पत्र की कोई भूमिका रही हो। चुनावी घोषणा पत्र देश को कुछ देते हो अथवा राज्य को कुछ देते हो या नहीं देते हो इस बहस को एक तरफ छोड़ दिया जाए तो देश और राज्य की जनता को नारे जरूर दे जाते हैं। भारत जैसे आधुनिक दौर के लोकतंत्र में चुनावी घोषणा पत्र केवल वोट के मकसद से तैयार किए जाते हैं।
एक उचित एवं तार्किक मंथन किया जाए तो चुनावी घोषणापत्र  अनिश्चय की स्थिति वाले मतदाताओं को किसी पार्टी में सत्ता में आने पर उसके कार्यकाल की झलक दिखाने का जरिया हो सकते हैं। यह वैचारिक और क्षेत्रीय विविधता वाले समूह के लिए पार्टी का समावेशी एजेंडा हो सकता है। कौनसे दल राजनीतिक मौकापरस्ती से है परिचित हो सकते हैं जबकि कुछ नैतिक आदर्शों के प्रति प्रेरित हैं परिचित हो सकते हैं। भारत में मध्यम वर्ग को आकर्षित करने के लिए चुनावी घोषणा पत्र की खोज हुई थी। चुनौती सिर्फ तब है जब चुनावी वायदे पूरे नहीं किए जाएं तो झूठ से पर्दा हट जाता है। इसकी एक वजह घोषणा पत्रों की प्रकृति में ही निहित है। चुनावी घोषणा पत्रों के संदर्भ में भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश ने भी कही थी चुनावी घोषणापत्र कागज का एक टुकड़ा भर बनकर रह गए और राजनीतिक दलों को इसके लिए उत्तरदाई बनाया जाना चाहिए। वास्तव में यही है कि समय के साथ राजनीतिक दल घोषणा पत्र के वायदों को पूरा नहीं करने के लिए अजीबोगरीब बहाने बनाने लगे। जैसे कि ‘पार्टी के सदस्यों की एक राय नहीं है’ या ‘समय का अभाव रहा’ या ‘सदन में कुछ और ज्यादा जरूरी कार्य आ गए’,
उदाहरण के तौर पर  साल 2004 में कई राजनैतिक दलों ने महिला आरक्षण विधेयक का वायदा किया था। फिर 2009 और फिर 2014 में यही वायदा दोहराया गया लेकिन इसके बावजूद भी अभी तक हाल वैसा ही है। चार प्रमुख राजनीतिक दलों की अध्यक्ष महिलाएं थी सत्ता और विपक्ष में रहते हुए भी कोई उल्लेखनीय कदम इस महिला आरक्षण विधेयक को लेकर नहीं उठाया गया। दूसरा उदाहरण हर बार संविदा नौकरी के रूप में सरकारी शोषण को रोकने की होती है लेकिन पिचले एक दशक से ये आर्थिक शोषण भी जारी है। वायदों को पूरा करने के लिए न्याय के उपाय सीमित है। एडवोकेट या मिथिलेश कुमार पांडे द्वारा सुप्रीम कोर्ट में दायर जनहित याचिका से यह बात साफ हो गई कि अदालत का काम पूरा नहीं किए गए वायदों को पूरा कराना नहीं है। खंडपीठ ने इस याचिका को अयोग्य मानते हुए खारिज कर दिया। 2014  के आम चुनाव के लिए चुनाव आयोग द्वारा तैयार आदर्श आचार संहिता के दिशा निर्देशों में राजनीतिक दलों द्वारा अपने घोषणापत्र में ऐसे वायदे करने से मना किया गया था जो मतदाता पर अवांछित असर डालते हैं। हालांकि आदर्श आचार संहिता को भी उसी तरह से कानून द्वारा लागू नहीं कराया जा सकता और यह भी एक व्यर्थ की कवायद सिद्ध हो जाती है। चुनाव आयोग ने इसका पालन कराने की कोशिश की इस में अगस्त 2016 में अन्ना द्रमुक द्वारा तमिलनाडु विधानसभा चुनाव 2016 के घोषणा पत्र में किए गए चुनावी वायदे को पूरा करने के लिए तर्कपूर्ण वित्तीय प्रबंध और साधन नहीं बता पाने पर इसे सेंसर कर दिया था।
लेकिन अब यह जरूरी है कि वैधानिक प्रावधान करके राजनीतिक दलों को उनके चुनावी वादों को पूरा करने के लिए उतरदायी बनाया जाए। जन शिकायत कानून और न्याय पर संसद की स्थाई समिति ने भी सिफारिश की थी कि आदर्श आचार संहिता को कानूनी रूप से बनाया जाए इसे जनप्रतिनिधि अधिनियम 1951 का हिस्सा बनाया जाए। इससे चुनाव आयोग की शक्तियां बढ़ेगी और राजनीतिक दलों में चुनावी घोषणा पत्र में खोकले वायदे न करने का डर पैदा होगा। मेरे हिसाब से एक ऐसी कानूनी व्यवस्था हो जिसमें किसी भी दल या नेता द्वारा किये गए वायदे पूरे न करने पर जनता गद्दी से उतार सकती हो, जिसे राईट टू रिकॉल भी कह सकते है।  इसके साथ ही जुर्माने का भी प्रावधान होना चाहिए। कठोर कानून हो तभी इस प्रकार के उत्तरदायित्व से हमारी राजनीतिक व्यवस्था में वादा करके भूल जाने की आदत को छोड़ते हुए फिर से जिम्मेदारी का एहसास पैदा होगा।
इस बदलाव हेतु हमें दो स्तरों पर काम करना होगा। प्रथम, कानून जिसे चुनावी घोषणा से जुड़े वायदों को पूरा करना कानूनन बाध्यकारी होगा और दूसरा सिविल निगरानी व्यवस्था जो राजनीतिक दलों के फायदे करने और उन्हें पूरा करने पर निगरानी रखेगी। ऐसे कानून के तहत किसी भी संस्था व्यवस्था को यह जिम्मेदारी दी जा सकती है अथवा बेरोजगार युवाओं को हिन्दू-मुस्लिम से निकालकर रोज़गार के रूप में यह कार्य दिया जा सकता। यहां जनभागीदारी महत्वपूर्ण है। ऐसे में यह संस्था सरकार के कार्यकाल के प्रत्येक वर्ष के अंत में  चुनावी घोषणापत्र किए गए वादों को पूरा किए जाने पर फैसला दे सके। साथ ही चुनाव से पहले ही गठबंधन के सरदारों के बीच न्यूनतम साझा कार्यक्रम होना चाहिए अन्यथा आजकल गठबंधन राजनीति को चुनावी घोषणापत्र से निकलने का आसानी से मार्ग प्रशस्त हो सकता है। वास्तव लोकतंत्र के दो रास्ते हैं एक उस दिशा में जाता है जहां राजनीतिक दल नीति और तरीके से मामूली बदलाव के साथ एक किस्म के वायदे कर रहा है। आज स्थिति बड़ी ही भयावाह हो चुकी है जिसके चलते भारत में चुनाव को अमीरों के लिए निवेश बना दिया गया है। जिसमे हर एक व्यक्ति की क्रय शक्ति से ही दल में उसकी भूमिका तय होती है। दूसरा रास्ता है आसमान से तारे तोड़ लाने वाले वादों की सिविल सोसाइटी द्वारा निगरानी की जाए, कानूनी पकड़ हो और राजनीतिक दलों खुद भी जवाबदेही हो।
अगर लोकतंत्र निर्वाचित प्रतिनिधि और आम जनता के बीच एक सामाजिक संविदा है तो चुनावी घोषणा पत्र को विधिक संविदा बनाना ही होगा जिसके माध्यम से देश के विकास का एजेंडा आगे बढ़े बढ़ाया जा सके भारत का लोकतंत्र फले-फूले इसके वास्ते जरूरी है कि घोषणा पत्र के लिए हर हाल में उत्तरदायित्व तय किया जाए। उम्मीद है देश के रहबरों और नीति-निर्धारकों द्वारा इस दिशा में उचित कदम जरुर उठाया जाएगा क्योंकि यह वर्तमान की महती आवश्यकता है। समय रहते ये उपचार नहीं किया गया तो वर्तमान लोकतंत्र के घातक ही सिद्ध होगा। वर्तमान स्थिति लोकतंत्र को तानाशाही की ले जाने वाली है ।....इंक़लाब जिंदाबाद।

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