Tuesday, 5 June 2018

जय जवान जय किसान या लाचार जवान बेचार किसान!

डॉ. नीरज मील


जय जवान जय किसान का नारा भारत में इस कद्र देश के नागरिकों पर चढ़ा कि वे इसके प्रति समर्पित होने लगे। ये नारा आकर्षक जरुर था लेकिन नारा ही बन कर रहा गया। माननीय पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के साथ ही ये नारा भी राष्ट्रीय पटल से धीरे-धीरे विदा हो लिया है। आज हिन्दुस्तान की जो तस्वीर जवान और किसान को लेकर सामने आ रही है वह वास्तव में भयावह है। जहां जवान सीमा पर बेवजह एकतरफा संघर्ष में शहादत को प्राप्त कर रहा है तो वहीँ किसान गलत नीतियों के चलते बुनियादी हक़ नहीं मिलने से अकाल मृत्यु को प्राप्त हो रहा है। जो किसान को खेत में कार्य कर देश के विकास में सहर्ष योगदान के लिए अपने खून को सींचने को तैयार होता है वह आज अपने बुनियादी हक़ के लिए संघर्षरत है। जवान देश की रक्षा के लिए अपने प्राणों को न्योछावर को तैयार रहने वाला बिना साहस का परिचय दिए ही शहादत को प्राप्त करने को मजबूर है।
वैसे तो अखबार ख़बरों को तरसता है लेकिन आज आलम ये है कि वे ख़बर क्यों नहीं छापी जाती जो वास्तव में ख़बर होती है। खेती की बढती लागत, गलत कृषि नीति, उपज के मूल्य निर्धारण का हक़ और कर्जमाफी को लेकर जारी हुए किसान आन्दोलन का आज पांचवा दिन है। सरकार को जहां इस आन्दोलन को लेकर गंभीरता से लेने और संवेदनशीलता से समझकर किसानों की सुध लेनी चाहिए थी लेकिन लगातार बरती जा रही उदासीनता देश के आंतरिक माहौल और अर्थव्यवस्था के लिए न केवल चुनौती वाला है बल्कि घातक भी है। किसान अपने क्षोभ का प्रदर्शन अपनी उपज(दूध, सब्जिया इत्यादि) को सड़कों पर फैंक कर रहे हैं। देश व राज्यों की सरकारों को कॉर्पोरेट के भंवर से निकलकर इस क्षोभ को महसूस करना चाहिए। यह वास्तविकता है कि कृषि कभी भी फायदे का सौदा नहीं रही है। वर्तमान में आये मानसिक एवं वैचारिक बदलाव के बावजूद किसानों ने त्यागपूर्वक जींवन को ही तवज्जों दी है। लगातर हो रही किसानों अनदेखी और खेती के लिए लिया गया क़र्ज़ अलाभकारी खेती के चलते किसानों की आत्महत्या का कारण बन गया। इस आन्दोलन के दौरान भी मध्यप्रदेश और राजस्थान में किसानों द्वारा की गयी आत्महत्या की ख़बर समाज और देश को झकझोर कर रख देने वाली है। विपरीत परिस्थियों में जो किसान खेती कर, प्राकृतिक विपदाओं से झूझकर एवं लड़कर, बिना किसी बीमा लाभ के अपनी उपज पैदा करता है और मंडी में लेकर आता है जहां उसे उसकी लागत का दसवां हिस्सा भी नहीं मिल पाता है तो क्या ये तस्वीर देश को शर्मसार कर देने वाली नहीं है? क्या ये स्थिति सरकार की कृषि के प्रति घोर उदासीनता नहीं है? क्या ये किसान की मेहनत का मज़ाक नहीं है? ऐसे में एक किसान आत्महत्या नहीं करेगा तो और क्या क्या करेगा?
बढती लागत, विपदाओं का तूफ़ान, जलवायु परिवर्तन की चुनौतियाँ, और देश को आर्थिक संबल देने के बावजूद उद्योगों को प्राथमिकता देना कहाँ तक नीतिगत और जायज है? यहां यह बात भी गौर करने लायक है कि देश के कारखाने और उद्योगों की खुशहाली और प्रगति भी खेती से ही तय होती है। एक भी ऐसा उद्यागो नहीं है जो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कृषि आधारित न हो! ऐसे में क्या कृषि की जगह उद्योगों को प्राथमिकता देना कृषि और उद्योग दोनों की ह्त्या कर देश को आर्थिक गुलामी की ओर ले जाने वाला कृत्य नहीं है? सवाल ये भी उठता है कि जब आयोगों की सिफारिशे लागू ही नहीं करनी तो इनके गठन का औचित्य ही क्या है? ऐसा ही एक आयोग है स्वामीनाथन आयोग जिसका गठन 2004 में कृषि स्थिति के सुधार हेतु सुझाव देने के वास्ते किया गया था। इस आयोग ने किसानों की लागत में 50 फीसदी लाभ जोड़कर किसानों को देने, कर्जमाफी और 1 प्रतिशत ब्याजदर पर ऋण देने, उन्नत बीज और बेहतर किस्म के बीज कम कीमत पर उपलब्ध करवाने, किसानों के लिए जोखिम फण्ड बनाने, फसल बीमा को सामान्य बीमा के रूप में हर फसल के लिए सम्पूर्ण प्रदेश में लागू करवाने, और वन एवं कृषि भूमि को कोर्पोरेट क्षेत्र को न देने जैसी महत्वपूर्ण सिफारिशे की थी लेकिन आज दिनांक तक इन्हें लागू नहीं की गयी। आयोग की ये अनिवार्य सिफारिशे वास्तव में कृषि  आवश्यकताओं की पूर्ति करने वाली हैं। इन सिफारिशों को एतद नकारना या लागू न करने की नीति वास्तव में सुनियोजित तरीके से कृषि को ख़त्म करने वाली है।
इस प्रकार की सिफारिशों के लागू न होने से किसानों को लगने लगा है कि कृषि का भविष्य खतरे में हैं इसीलिए किसान खेतों के बजाए सड़कों पर आ गए। किसानों का इस तरह से सड़कों पर आना वास्तव में उनकी माली हालातों को बयां कर रहें है। मंदसौर में पिछले साल छह जून को हुए किसान आन्दोलन में छः किसान मारे गये थे। हाल ही में इस आन्दोलन का असर बाज़ार में दूध और सब्जियों की अनुपलब्धता सामने आई है। इससे न केवल आवश्यक चीजों में कमी आई है बल्कि इनके मूल्य में अप्रत्याशित रूप से वृद्धि भी हो रही है। इन वस्तुओं की कालाबाजारी भी ज्यादा होने लग गयी है। यहां यह समझने की आवश्यकता है कि किसान अपना नुकसान करके भी आन्दोलन क्यों कर रहा है? वास्तव में ऐसी स्थिति तभी हो सकती है जब वो ज्यादा और बहुत ज्यादा जरुरी हो।
एक उदाहरण आम है जिसे हर उस जगह पेश किया जाता है जहां सामयिक कीमत की तुलना होती है लेकिन मैं इसी उदाहरण को एक अलग तरीके से पेश कर रहा हूँ। 1988 में जहां सोने की कीमत 3130 प्रति 10 ग्राम थी जबकि गेहूं की कीमत मात्र 183 रूपये प्रति क्विंटल थी। उल्लेखनीय है कि आज स्वर्ण की  कीमत 31 हज़ार 8 सौ है और गेहू 18 सौ मात्र। दोनों ही वस्तुओं में प्रतिशत इजाफा करीब-करीब समान है लेकिन यहां यह गौर करने लायक है कि मनुष्य के लिए क्या गेहूं जो कि अनाज है वो ज्यादा महत्वपूर्ण है या स्वर्ण? स्पष्ट है कि देश में किन वस्तुओं को ज्यादा तवज्जों दी गयी है। क्या सरकार अब कुछ करेगी जबकि वो अपने सांसदों और विधायकों के लिए तो हर साल उनकी आय और स्रोतों  में इजाफ़ा कर दिया जाता है?
सुझाव के रूप में सरकार को चाहिए की वो कृषि से अपना नियंत्रण हटा ले। क्यों नहीं कृषि को भी समूल मुक्ति देते हुए इसे भी एक उद्योग का दर्ज़ा दे दिया जाएं? किसानों को अपनी उपज के मूल्य निर्धारण का हक़ भी मिल जाएगा और खेती एक स्वतंत्र पेश भी बन जायेगी। इसके अतिरिक्त वर्तमान परिपेक्ष में देखना होगा कि लचर और बेकार कृषि नीतियों को ख़त्म कर देना चाहिए। सरकार को समझाना होगा कि मंत्रालय के आलिशान एवं वातानुकूलित कमरों में बैठकर नौकरशाहों द्वारा तैयार की जाने वाली नीतियों से न तो कृषि का भला हो सकता है और न ही देश की अर्थव्यवस्था में सुधार ला सकती हैं। इन नौकरशाहों को जमीनीं हकीकत का पता ही नहीं होता है। इन नीतियों के निर्माण में किसानों की आम भागीदारी को सुनिश्चित की जाए।

समय रहते किसान और खेती को नहीं संभाला गया तो आने वाला समय देश की अर्थव्यवस्था को गर्त की ओर ले जाने वाला होगा। कल ही मानसा में एक सब्जियों से भरे ट्रक को लूट लिया गया जो अराजकता की ओर इशारा करने वाला है। किसानों द्वारा आन्दोलन करना या विरोध प्रदर्शन करना उनका बुनियादी हक़ है जिसमें किसी को दखल नहीं देनी चाहिए। सरकार को समय रहते किसान और जवान को शक्ति और संबल देना चाहिए न कि हत्तोत्साहित करना...... 
इंक़लाब जिंदाबाद।
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