Wednesday, 13 June 2018

समय की दरकार : जीएसटी में करो सुधार

डॉ. नीरज मील

वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) बहुत बड़ा बवाल खड़ा हुआ था इसके आने से पहले और लागू होने के बाद भी। उसके बाद सरकार ने वादा किया था की इस की दरों की समीक्षा की जाएगी लेकिन कालान्तर में ऐसा प्रतीत हो रहा है मानों वो वादा भी हवा-हवाई हो गया है। अगर राजस्व आंकड़ों की बात की जाए तो सरकारी आंकड़ों के हिसाब से जुलाई 2017 का कलेक्शन 93,590 रूपये था जो अगस्त  माह में 93029रूपये हुआ यानी थोडा कम हुआ लेकिन सितम्बर माह में ये संग्रहण बढ़कर 95132 हुआ। इसके बाद ये संग्रहण माह अक्टूम्बर में एक बार फिर से फिसल कर 85931 पहुँच गया। यह फिसलन नवम्बर2017 में भी जारी रही और वसूली मात्र 83716 पर आकर रह गयी। करदाताओं ने संबल प्रदान करते हुए इस वसूली को दिसम्बर 2017 में वापस इजाफा कर के 88929 रूपये की वसूली हुई लेकिन इसके बाद एक फिर से थोड़ी गिरावट के साथ ये वसूली 88047 आंकी गयी जो फरवरी में थोड़ी सी व्रद्धी के साथ 8926 पर पहुँच गयी।        अप्रैल में माह मार्च का कुल 1,03,458 करोड़ रुपये जीएसटी कलेक्शन हुआ है। इसी तरह मई 2018 में माह अप्रेल का 94,016 करोड़ रूपये है। यह केवल एक विशेष समयावधि की विषयवस्तु है और इसको आधार मानकर निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। हालांकि इसमें कोई दो राय नहीं है कि जीएसटी राजस्व के आंकड़े एक स्वस्थ और मजबूत कर वसूली की तस्वीर बयां कर रहे हैं। पिछले 5 वर्षों की प्रवृति देखे तो ज्ञात होता है कि राजस्व एवं सेवाकर की सबसे कम वसूली अप्रेल माह में ही होती है जो कि पूरे वर्ष की कर वसूली के मात्र 7 फीसदी के आसपास रहती है जबकि मार्च माह में यही वसूली सबसे अधिक दर्ज की गयी है जो कि करीब 11 फीसदी तक पहुच जाती है। स्पष्ट है कि कुछ निजी व्यावसायिक मान्यताओं और धारणाओं के चलते ऐसी गिरवट आती है। यहां यह ध्यान देने योग्य है कि 1,03,458 करोड़ रुपये से 94,016 करोड़ रूपये की गिरावट विगत प्रवृति से कम ही है इसलिए इसे चिंताजनक नहीं माना जा सकता। दुसरे एंगल से देखे तो 2018-19 में जीएसटी की वसूली 7.44 ट्रिलियन रूपये का बजटीय अनुमान लगाया गया है जो इस गिरावट के मुकाबले कही अधिक प्रभावशाली है। स्पष्ट है कि इन उतार चढ़ावों के बीच ट्रेंड यही कहते हैं कि अप्रेल माह की वसूली का मानक आंकड़ा 52 हजार करोड़ रूपये के आस पास रहनी चाहिए अर्थात यह वर्ष भर के लक्ष्य का 7 फीसदी थी लेकिन वास्तविक आंकड़े 94 हज़ार रूपये से ज्यादा है जो लक्ष्य के 12 फीसदी से भी उपर है।
कुल मिलाकर यह अप्रत्याशित वृद्धि नहीं है क्योंकि जीएसटी कर की वह साधारण प्रणाली है जिसे आम करदाता स्वीकार कर रहा है। यही कारण है कि जीएसटी आने के बाद आम करदाताओं की संख्या में अभी असाधारण 53 फीसदी की वृद्धि हुई है। इस कर प्रणाली ने जहां एक ओर लोगों को कर के दायरे में आने के लिए आकर्षित भी किया है वहीँ दूसरी और बेईमान प्रकृति के लोगों पर शिकंजा भी कसा है। इस शिकंजे की बदौलत भी करदाताओं की संख्या में अभिवृद्धि हुई है। स्पष्ट है कि जीएसटी सरकार की वित्तीय सुदृढ़ीकरण की दिशा में एक मील का पत्थर साबित हो रहा है। यह भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए भी बेहतरीन संकेत हैं। लेकिन ये तभी संभव है जब बाह्य घटक एवं सरकार के स्वयं के खर्चे स्थिर ही रहे।
इस प्रकार हो रही जीएसटी की असाधारण वसूली का लाभ राज्यों को भी मिलेगा इसमें कोई दो राय नहीं है। जो अधिकतर राज्यों द्वारा तैयार किये गए बजट में राजस्व अनुमानों से साफ़ पता चल रही है। राज्यों के वर्ष 2018-19 के बजट पूर्वानुमान का अध्ययन करें तो ज्ञात होता है कि लगभग 16 राज्य ऐसे हैं जिन्होंने जीएसटी की आशातीत वसूली के चलते अपने राजस्व में 50 फीसदी या इससे अधिक की वृद्धि का अनुमान लगाया है। यह भी सही है कि जुलाई 2017 से जीएसटी लागू हो जाने के बाद देश के राज्यों का राजस्व प्रभावित हुआ है। इसीलिए केंद्र सरकार के अनुसार जारी हुए आंकड़ों में एक और बात साफ होती है कि अब तक वसूल हुए जीएसटी में से एक बड़ा हिस्सा राज्यों को क्षतिपूर्ति के रूप में वापस किया जाएगा। इसी के चलते केंद्र सरकार ने 2017-18 के सम्पूर्ण वर्ष के लिए राज्यों को लगभग 48 हजार करोड़ रूपये आबंटित किये हैं जो कुल क्षतिपूर्ति का 75 फीसदी है। इस प्रकार स्पष्ट होता है कि केंद्र व  राज्यों द्वारा वसूल की जाने वाली जीएसटी एक लाभकारी कर प्रणाली है। ऐसे में यदि क्षतिपूर्ति उपकर की वसूली का यही प्रवाह रहा तो सरकार करदाताओं से वसूल किए गए राजस्व की एक बड़ी राशि का लाभ उठा सकती है क्योंकि यह जीएसटी राशि तो राजस्व(जीएसटी)  क्षतिपूर्ति कोष में काफी समय तक रहेगी। ऐसे में सवाल यही है कि क्या सरकार के नुमाइंदे इस स्थिति का फायदा उठा पाएंगे?
जीएसटी व्यवस्था में यह प्रावधान एकदम साफ़ है कि क्षतिपूर्ति उपकर केवल 5 साल लगाया जाएगा। राज्यों के दावे के बावजूद अगर इस शेष से कोई राशि शेष रह जाती है तो उसे 5 साल बाद केंद्र और राज्यों में बराबर बांट दी जायेगी। खैर फिलहाल स्थिति ये हैं कि अगर 2018-19 में क्षतिपूर्ति उपकर की कुल उम्मीद नब्बे हज़ार करोड़ है और अगर राज्यों द्वारा मांग करने और उसकी पूर्ण पूर्ति के बाद भी 25 फीसदी हिस्सा शेष रह जाता है तो 5 साल में यह क्षतिपूर्ति कोष 1 लाख करोड़ रूपये से भी ऊपर चला जाएगा।
बढती महगाई और तेल के दामों में वृद्धि के मध्यनजर सरकार को जीएसटी दरों की समीक्षा कर उन्हें कम करने का कदम उठाना चाहिए। साथ ही जीएसटी उपकर को भी कम कर देना चाहिए। वर्तमान में जीएसटी उपकार बोतल बंद पानी, सिगरेट, मोटर वाहन एवं तम्बाकू जैसे 50 मदों पर लगता है। अनुकूल परिस्थितियों को देखते हुए जीएसटी परिषद को निश्चित रूप से पानी की बोतलों, स्पोर्ट्स यूटिलिटी जैसी मदों पर कम करने की सिफारिशे कर देनी चाहिए। क्योंकि जब जीएसटी क्षतिपूर्ति उपकर की इतनी आवश्यकता ही नहीं है तो बेवजह जनता पर लादने का कोई और औचित्य भी नज़र नहीं आ रहा है।
स्पष्ट है राज्यों के राजस्व में भी लगातार स्थिति सामान्य हो रही है और तेजी से बढ़ रही है तो फिर पेट्रोल और डीजल को भी जीएसटी ले दायरे में लाने में क्या दिक्कत है? सरकार को सोचना चाहिए कि राजस्व में एक लम्बी अवधि के लिए कोष का जमा रहना भी अर्थव्यवस्था के लिए अच्छा नहीं माना जा सकता। इसके अतिरिक्त जीएसटी के अंतर्गत आए इस अप्रत्याशित अभिवृद्धि के वास्तविक कारणों का पता लगाना चाहिए एवं अगर ये सही है तो रोजमर्रा की चीजों पर जीएसटी दरों में कमी कर देनी ही चाहिए। अब समय की मांग भी है कि जीएसटी दरों में कटौती की जाए। पेट्रोल व डीजल के लिए 32 से 35 फीसदी की एक नयी स्लैब बने जा सकती है या फिर 28 प्रतिशत में भी शामिल करने में कोई हर्ज़ नहीं है। हालांकि वर्तमान में तेल पर 62 से लेकर 94 फीसदी तक टैक्स लग रहा है। तेल को जीएसटी के अंतर्गत लाने के तात्कालिक और दीर्घकालीन लाभ है इसलिए इस मुद्दे को विचारा जाना चाहिए। चुनाव भी नजदीक हैं और अगर ऐसा नहीं किया जाता है तो इसका खामियाजा भी सतारुढ दल को भुगतना पद सकता है।

इसमें कोई दो राय नहीं है कि जीएसटी का दायरा अभी और बढ़ेगा। इसलिए टैक्स की वसूली में भी अभिवृद्धि होगी। स्पष्ट है कि जीएसटी में ये आमूलचूल परिवर्तन न केवल आवश्यक हैं बल्कि अपिहार्य भी है। इसलिए समय रहते इन पर विचार नहीं किया गया तो अर्थव्यवस्था के लिए स्थिति का स्थिर रहना निश्चित ही घातक है......             इंक़लाब जिंदाबाद।




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