Monday, 17 December 2018

भाषा की नैतिकता भी है जरुरी।

        डॉ.  नीरज मील 



      इंडिया में हर चुनाव कुछ ना कुछ नया लेकर जरूर आता है। ऐसे में हाल ही में संपन्न हुए चुनाव के मद्देनजर यह बात गले नहीं उतरती है कि ये चुनाव कुछ नया लेकर नहीं आये! देश में चुनावों में वोट के लिए दारू यानी शराब एक अहम हथियार बन गया है। जो कि ना केवल अनैतिक है बल्कि असामाजिकता को भी बढ़ावा देता है। इसी के समानांतर है भाषा की गिरावट। पिछले चुनावों के हिसाब से यह प्रवृत्ति बन चुकी है कि प्रत्येक चुनाव में भाषा की नई गिरावट दर्ज की जाती है। चुनावी भाषणों में एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप आम बात है लेकिन चुनाव के भाषणों के दौरान भाषा की गिरावट एक स्तर के बाद अस्वीकार्य हो जाती है। यह जरूरी है कि लोकतंत्र के मूल्य भाषा और भाषण के भीतर भी होने चाहिए। आदर्श आचार संहिता में इस बात पर भी जोर दिया जाना चाहिए कि चुनावी भाषणों के दौरान काम में ली गई भाषा एक उचित स्तर तक तय हो। यह इसलिए भी जरूरी है ताकि किसी को आर्थिक, सामाजिक या  परिस्थिति वश कमजोरी के मजाक को न उड़ाया जा सके। लोकतंत्र में सारी लड़ाई एहसास-ए-कमतरी से उबरने के लिए है और दूसरों को उबारने के लिए होनी चाहिए। ऐसी मानसिकता हम सभी को रखनी चाहिए। सभी चुनावी उम्मीदवारों को रखनी चाहिए लेकिन ऐसे में जब देश का प्रधानमंत्री ही अपने भाषणों में वाहियात भरे शब्द और वाक्य काम में लें तो दूसरों की बात करना भी बेमानी साबित होता है।
       'यह कांग्रेस की कौन सी विधवा थी?' प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपनी एक चुनावी सभा के दौरान ये वाक्य चुटकी लेकर कहा। प्रधानमंत्री के भाषण पर शायद ही किसी ने सजगता दिखाई हो लेकिन प्रधानमंत्री द्वारा अपने चुनावी भाषण विधवा शब्द को इतनी तिरस्कार के  साथ काम में लेना वास्तव में एक गंभीर बात है। और गंभीर कभी भी अच्छा नहीं हो सकता। ऐसे में शेष वक्ता और नेता क्या सीखेंगे प्रधानमंत्री से? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब चुनावी सभा के दौरान सोनिया गांधी का नाम लिए बगैर कांग्रेस की विधवा कहते हैं तो यह हो सकता है कि सोनिया गांधी के लिए काम में नहीं लिया गया हो ऐसे  यह शब्द इंडिया की उन तमाम महिलाओं के ऊपर ही लागू माना जाता है और उनकी स्थिति की खिल्ली उड़ाता है जो इस वक्त समाज में उस भयंकर और भयावह परिस्थिति से अकेली जूझ रही हैं लड़ रही है। हम सभी की जुबान फिसलती है लेकिन प्रधानमंत्री द्वारा हाल ही में दिए गए इस भाषण में जो शब्द इस्तेमाल किया गया और जिस तरह से इस्तेमाल किया गया, बार-बार इस्तेमाल किया गया इससे स्पष्ट होता है कि यह जुबान का फिसलना नहीं था बल्कि यह जानबूझकर इस्तेमाल किया गया था। यहां यह सवाल उठना लाजमी है कि आखिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा महिलाओं के प्रति इतना संवेदनहीन सम्बोधन क्यों किया गया?  क्या प्रधानमंत्री द्वारा नैतिकता को तकाज़े पर रखकर यह संवेदनहीन संबोधन नहीं दिया गया? किसी को भी विधवा कहना भले ही कानूनी रूप से अपराध नहीं है लेकिन नैतिकता के पैमाने पर और ऐतिहासिक रूप से निश्चित ही घोर अपराध है। आखिर महिलाओं के प्रति हमारी सोच कब बदलेंगी?
किसी किसी देश में या समाज में महिला के सशक्तिकरण का आशय उस देश या समाज में किसी महत्वपूर्ण या ऊंचे ओहदे पर सर्वप्रथम बैठना या पाना ही नहीं है बल्कि सही मायनों में किसी भी स्थिति में या परिस्थिति में महिला के लिए उन शब्दों या भाषा से आज़ाद होने में भी है जो महिला को सम्मान ही न दे सके। उस नज़र से मुक्त होना भी महिला सशक्तिकरण है जो उन्हें एक ख़ास नजर से देखती है। किसी देश के प्रधानमंत्री द्वारा सार्वजनिक तौर पर अपने भाषण में महिलाओं के प्रति इस प्रकार का संवेदनहीन संबोधन हमारे देश मे महिलाओं के प्रति न केवल रवैये को प्रदर्शित करता है बल्कि मानसिक दिवालियेपन पर भी रोशनी डालता है। एक्स समाज के तौर पर भी हमें संवेदनहीन साबित करता है।विधवा समाज में अकेले रहकर जो सही संघर्ष कर रही महिलाओं के लिए एक क्रूर शब्द है। गौर करें तो इस शब्द ने उसे जिंदा रहते हैं जिंदगी के समस्त पहलुओं से बेदखली करने वाला शब्द है जिसकी बदौलत महिलाओं को संपत्ति से, संस्कार से, सम्मान से, घर से और परिवार से वंचित कर दिया जाता है। इन औरतों का अकेलापन इंडिया के समाज का क्रूरता का पुख्ता दस्तावेज है।
       इसलिए कहा जा सकता है कि शब्दकोष के क्रूरतम शब्दों में से एक है विधवा।यातना व अपमान का प्रतीक है विधवा शब्द। अगर किसी को जरा भी इल्म होता है एहसास-ऐ-आरी का तो वो कभी भी किसी को विधवा नहीं कहेगा।इसीलिए ये शब्द एक औरत को घृणा से देखने के मजबूर करता है।क्या इस शब्द का इस्तेमाल इतना आसान है? गौर करने लायक है, लेकिन इसके प्रत्युत्तर में कोई भी व्यक्ति यह स्वीकार करने के लिए राजी नहीं होगा। यह सही है कि विधवा शब्द का इस्तेमाल आसानी से नहीं किया जा सकता। सोचिए, जब यह शब्द आसानी से इस्तेमाल नहीं किया जा सकता तब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा सार्वजनिक स्थान पर कैसे इस्तेमाल कर गए! फर्क इस बात से नहीं पड़ता कि क्या हो गया फर्क इस बात से पड़ता है कि क्यों किया गया? सवाल कीजिए अपने आप से, क्या कोई अपनी मां,बहन,बेटी किसी और रिश्तेदार को इस शब्द से संबोधित कर पायेगा? दूसरों को भी संबोधित करते वक्त आप कितना सहज अनुभव करेंगे? इस आलेख के माध्यम से मेरा मकसद किसी को आहत पहुंचाना नहीं है और न ही किसी की इज्जत को कम करना है, लेकिन लिखना जरूरी था समझाने के लिए, समझने के लिए। ऐसे में सभी को विशेषकर प्रधानमंत्री पद पर बने हुए व्यक्ति को अपने भाषणों में नैतिक शब्दावली का प्रयोग, शब्दों के चयन में उचित सावधानी व अपने पद की गरिमा का ध्यान रखना बेहद जरूरी हो जाता है।  जब लोग आपको अनुसरण कर रहे हो, ऐसे में प्रधानमंत्री का भी कर्तव्य बनता है कि वह अपने भाषणों में संयम के साथ नैतिकता का ध्यान रखते हुए ऐसे शब्द काम में ना लें जो उनकी पद की गरिमा के अनुरूप नहीं है और समाज में किसी प्रकार की कोई ईर्ष्या, द्वेष या किसी प्रकार की घृणा का संचार करते हो।
         एक प्रेरणा है संघर्ष की।  एक उदाहरण है जिंदगी को ढोने का । इसलिए हमें इस बारे में भी ध्यान रखना चाहिए कि हमारे अधिकार तब तक ही सुरक्षित है जब तक हम अपने कर्तव्यों का निर्वहन करने में किसी प्रकार की कोई कोताही नहीं बरतते हैं। कर्तव्य निर्वहन के बाद ही हमारे अधिकारों की बात आती है। विधवा देश के लिए,समाज के लिए कोई बोझ नहीं बल्कि एक दायित्व हैं। विधवाएं समाज के लिए कलंक नहीं है। फिर भी कलंक मानना हमारी दोहरी मानसिकता का ही प्रमाण है। अंत में यही सवाल शेष रहता है कि आखिर बदलाव कब आएगा? कब एक औरत को समाज का इस प्रकृति का अभिन्न हिस्सा है, पहलू है को बराबरी का दर्ज़ा मिलेगा? क्यों न विधवा जैसे अभिशप्त शब्द को ही हमारे शब्दकोश से विच्छिन्न कर दें? संकल्प ले कि और कोई नहीं बल्कि हम आज से बल्कि अभी से इस शब्द का प्रयोग किसी के लिए भी नहीं करेंगे। भाषा की नैतिकता है निःशब्द क्रांति, अगर हम अभी ये शुरुआत करते हैं तो निश्चित ही इसे आज की निःशब्द क्रांति का आगाज़ कहा जायेगा। इंक़लाब ज़िंदाबाद। 
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