Wednesday, 5 December 2018

हाथ मिले कारगिल और गले मिले गलियारा

डॉ. नीरज मील 'नि:शब्द'


        हाथ मिलने पर कारगिल और गले मिलने पर गलियारा। क्या यह वाकई करिश्माई बात नहीं है? निश्चित ही ऐसा करिश्मा गुरु नानक देव के नाम पर भारत-पाकिस्तान के दरमियां साबित हुआ। यह वह स्थिति है जहां भारत और पाकिस्तान आमने सामने सीमाओं पर एक दूसरे के चिर परिचित दुश्मन कहलाते हैं वही पहली बार एक अनोखी और एक अनूठी पहल गलियारे बनाने की हो तो तय है की राजनीति हमें कहीं और ले जाना चाहती है और हमारे वो रिश्ते जाना चाहते हैं दोनों मुल्कों के संबंध में हमने कई दौरे देखे हैं उन दोनों से झगड़े भी हुए हैं। हमारे मुल्क की मीडिया प्राचीन काल से ही प्रमुख मुद्दों को दबाने के लिए ही इस्तेमाल किया गया है क्योंकि सत्ता को बचाना ही संसाधनों का अंतिम लक्ष्य तय किया हुआ है और सत्ता हमेशा ही विदेशियों अथवा विदेशियों के मुहरों के द्वारा रही है। मीडिया चाहे वो इलेक्ट्रॉनिक हो प्रिंट सबने दोनों ही देशों की दरमियां युद्ध, फिल्म के अलावा हिंदू-मुसलमान का टॉपिक को भी खूब भुनाया है। हिंदू-मुसलमान का टॉपिक भारत की राजनीति में नेताओं के भाषण कुछ अलग ही अंदाज से जोश जुनून पैदा करने वाला होता है लेकिन क्या दो देशों के दरमियां एक दूसरे को दुश्मन  मानने का विचार ही अंतर्राष्ट्रीय सम्बन्ध है? सांस्कृतिक और विरासत आधार पर इतिहास की अब तक हुई घटनाओं को दरकिनार करते हुए एक नया इतिहास लिखें तो क्या करतारपुर का कॉरिडोर निश्चित ही केवल दो देशों के दरमियां ही नहीं बल्कि दोनों देशों की आवाम के लिए भी एक अच्छा संकेत माना जा सकता है? लेकिन इसके पीछे की तस्वीर का भी साफ होना जरूरी है।साफ़ है राजनीति कुछ और चाहती और नियति कुछ और! ऐसी ही भावनाएं, ऐसे ही विचार दोनों देशों के दरमियां होने वाले प्रत्येक परिणाम में दिखाई देते हैं। क्या यही अंतर्राष्ट्रीय सम्बन्ध हैं?
देश में राजनीति ही सिखाती है आपस में बैर रखना वरना आमजन को क्या आन पड़ी होती हैआज यह साफ हो चुका है और आने वाले समय में जब जनता अपनी जवाबदेही मांगेगी तब राजनीति में काम करने वाले किसी भी व्यक्ति के पास में न कोई जवाब होगा और नहीं कोई बात। साधारण शब्दों में 'अंतरराष्ट्रीय राजनीति' का अर्थ है 'देशों के मध्य राजनीति करना'। यदि 'राजनीति' के अर्थ का अध्ययन करें तो तीन प्रमुख तत्व सामने आते हैं - (क) समूहों का अस्तित्व; (ख) समूहों के बीच सहमति; तथा (ग) समूहों द्वारा अपने हितों की पूर्ति। ऐसे में स्पष्ट है कि हम उस राजनीति को जो वास्तव में हमारे लिए कुछ नया और अच्छा कर सकती है उसी का स्वागत करना चाहिए एवं राजनीति में सड़े गले उस विचार को जो हमारी प्रगति की राह में रोड़ा अटकाता है उससे हमेशा घृणा करनी चाहिए। जी हां मजहब मुल्क नहीं बनाता लेकिन मुल्क में मजहब जरूर बनते रहते हैं । इस बात को स्वीकार करते हुए हमें यह भी स्वीकार करना होगा यह हमारा अस्तित्व मजहब से नहीं प्रेम से है।
        आपसी संबंध ही वह संभावना होती है जो हमारे अंदर खुशियों को बिजली की भांति दौड़ा देती है लेकिन यह संबंध बिना किसी रोक-टोक के और स्वतंत्र रूप से होते हैं तो और भी अच्छे माने जाते हैं। दोनों देशों के दरमियां राजनीति के लिए जानबूझकर जहर घोला गया और अब यह लगने लगा है कि कहीं देश का बंटवारा जिसका कोई वजूद नजर नहीं आता वह भी सिर्फ राजनीति के लिए किया गया था! इतिहास के गहन अध्ययन से एक शंका यह भी उभरती है कि क्या अंग्रेज ही मुग़ल थे?  यहां यह भी गौरतलब है कि क्या हिंदुस्तान के बंटवारे के वक्त जो सांस्कृतिक, ऐतिहासिक, व धार्मिक स्थान भी पाकिस्तान से उठाकर हिन्दुस्तान लाये गए थे?  या वह भी इस तरह बंट गए कि हिन्दुओं के यहां रह गए और केवल मुस्लिम से संबंधित इमारतें बाबरी मस्जिद को छोड़कर बाकी के सारे पाकिस्तान चली गई! अब हमें सवाल नहीं करना चाहिए कि आखिर राजनीति सार्थक क्यों नहीं हो सकती? क्या राजनीति के द्वारा हम अपने पड़ोसियों से अच्छे संबंध नहीं बना सकते? क्या राजनीति के द्वारा हम विकास की उस सीमा को नहीं छू सकते जिस तक हम अब तक नहीं जा पाए?  क्या राजनीति से हम अपने जीवन को बेहतरीन नहीं बना सकते? क्या राजनीति से हम अपने देश को बेहतरीन देशों में शुमार करवाने की प्रतिबद्धता के क्रमबद्ध नहीं हो सकते? ना केवल प्रतिबद्धता, क्या सार्थक राजनीति से इस प्रतिबद्धता के लिए कोई अच्छा काम, कोई अच्छा कार्य, कोई अच्छी शुरुआत नहीं कर सकते? यह तमाम सवाल है जो केवल सवाल ही बनकर रह गए हैं बल की आज की आवश्यकता भी है और यह आवश्यकता अब अनिवार्य बन चुकी है हमारे देश जिसको हम इंडिया के नाम से जानते हैं क्या यह दिखाने के लिए बना है या फिर बिखरे हुए को समेटने के लिए? 1947 से पहले जो भी स्थिति रही होंगी क्या आज हमें उन स्थितियों में बदलाव की आवश्यकता महसूस नहीं होती? और अगर होती है तो क्या हमें इस बात का मूल्यांकन करने की आवश्यकता नहीं है कि हमने इस हेतु कितना कार्य क्या कार्य किया है ? और उसमें कितनी सफलता मिली है? वर्तमान में करतार कारीडोर की पाकिस्तान द्वारा किया गया शिल्यानास क्या उस एक अच्छी खुशी में नहीं मान सकते जो आपस में शेयर कर सकेंगे? अब यह नहीं लगने लगा कि हमने अब तक क्या बात की? क्या अब तक की गई बातें बेमतलब की बातें थी ? अगर हाँ तो फिर क्यों की? और अगर एक छोटे से प्रयास से इस तरह की बड़ी सफलता अगर हासिल हो सकती है तो अब तक की गई बातों का अस्तित्व क्या था ? और क्यों की गई यह सवाल और भी ज्यादा प्रखर और तीखा हो जाता है खैर राजनीति के इस गंदे माहौल को हम तभी बदल सकते हैं जब हम किसी के द्वारा अच्छी की शुरुआत करें और यह अच्छे की शुरुआत तब होगी जब हम अच्छा प्रयास करें एक नयी पहल करें 
         बहुत दिनों से इंडिया-पाकिस्तान के मुद्दे पर धूल पड़ी थी जो  अब करतार कॉरिडोर के बहाने ही सही फिर से सुर्ख़ियों में आयी है। क्या करतारपुर कॉरिडोर रिश्तों की नई डोर है? लेकिन इंडिया  विदेश मंत्रालय से सुषमा स्वराज ने एक कदम आगे रखते हुए साफ़ कर करदिया कि बातचीत शुरू नहीं होगी। यहाँ यह भी एक बात हो  सकती है कि जिस तरह के राजनीतिक सम्बन्ध इंडिया में नेताओं द्वारा जनता को परोसे हैं उस वजह से करतारपुर कॉरिडोर को भुनाने के लिए कोई तरकीब सोच रहे हो! वास्तव में महत्वपूर्ण है आमजन के संपर्क। जब दो ऐसे मुल्क जिनके वजूद की जड़ें आपस में मिली हुई है जो एक ही ऑर्गन से निकले हैं ऐसे में उन दोनों देशों के दरमियां आमजन के संपर्क ही संभावनाओं के रास्ते खोल सकते हैं और संबंधों को मजबूत व मधुर बना सकते हैं जब दो लोगों के दरमियां अच्छे संबंध होते हैं तभी विश्वास पनपता है तभी आत्मविश्वास और संबंध। अगर सम्पर्क ही नहीं रहते हैं तो संदेह निश्चित होते हैं और संदेह की स्थिति में न केवल संदेह ही रहते हैं बल्कि आत्मविश्वास और विश्वास भी टूट जाता है इसलिए आज इस पर विचार करना जरूरी है
                यहाँ यह शंका ज़ाहिर करना नाफरमानी होगा  कि इससे आतंक और आतंकवादीयों को सहूलियत मिलेगी। क्या जब दोनों देशों के बीच बात-चीत नहीं होती तब आतंक और आतंकवादी रुक जाते हैं? नहीं, तो फिर क्यों हम आगे नहीं बढ़ना चाहते? अगर फेसबुक  सोशल मीडिया पर या विदेशों में काम कर रहे कामगारों को देखा जाए तो आमजन को न पाकिस्तान से कोई दिक्कत है न पाकिस्तानियों से इंडिया व इंडियन से। ऐसे में युवा भी इस दिशा में अपनी भूमिका निभा सकते हैं और उन्हें निभानी ही चाहिए। जोखिम नहीं जोर से संबंधों को उठाना होगा और देखना होगा उम्दा मुस्तकबिल के लिए एक ख्वाब और करना होगा उस ख्वाब पूरा। समबन्ध  वजह से बन  रहे हैं यह महत्वपूर्ण नहीं है बल्कि महत्वपूर्ण सम्बन्ध बन रहे हैं यही है
                                                                                                                इंक़लाब ज़िंदाबाद 
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