Friday, 14 December 2018

इंडिया में बैंकिंग तंत्र की भूमिका पर संशय!

डॉ. नीरज मील 'निःशब्द'


          इंडिया की अर्थव्यवस्था चुनौतियों की पराकाष्ठा को पार करती हुई नजर आ रही है। टीवी चैनलों पर राजस्थान,मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ में मुख्यमंत्री कौन होगा, इस पर चर्चा जोरों पर है! स्पष्ट है कि न तो टीवी चैनलों के माध्यम से इंडिया की अर्थव्यवस्था को मजबूत किया जा सकता है और नहीं इन टीवी चैनलों पर होने वाली डिबेट से अर्थव्यवस्था को कोई फायदा हो सकता है। लेकिन सच यह भी है कि अर्जित पटेल ने इंडियन रिजर्व बैंक के गर्वनर पद से इस्तीफा दे दिया और इतिहास विषय मे स्नातकोत्तर उपाधि वाले शक्तिकांत दास को नया गर्वनर बना दिया है। फिर मुख्यमंत्री कौन होंगे चर्चाएं ज़्यादा महत्वपूर्ण हैं? नहीं तो क्यों हो रही है? क्या यह ट्रेंड है ? बिल्कुल अगर निष्पक्ष बात की जाए तो देश की अर्थव्यवस्था जब गर्दिश के उन स्थितियों को प्राप्त कर रही है जो न केवल घातक हैं बल्कि डरावनी और भयावह भी है। लेकिन ठीक उसी वक्त टीवी चैनलों, तमाम अखबारों में बुद्धिजीवियों के माध्यम से इस तरह की खबरें आमजन के पटल पर दिखाकर देश की जनता को बरगला और गुमराह जरूर किया जा सकता है। और यही इलेक्ट्रॉनिक व प्रिंट मीडिया के माध्यम से किया जा रहा है। देश की अर्थव्यवस्था किस ओर जा रही है, क्या आप ने सवाल किया है ? क्या आपके मन में ये सवाल उठा है कि आखिर इस देश में ऐसा क्यों हो रहा है? निश्चित ही न आपने और न मैंने ऐसा सवाल किया है और न हीं न देश की जनता में से किसी ने सवाल किया है। क्योंकि देश की जनता सवाल करना ही भूल चुकी है। गनीमत है की इसका प्रभाव तात्कालिक नहीं पड़ा है और जो पड़ा है उसको हम सबने आपस मे बांट लिया है। लेकिन पिछले कई दिनों से जो उठापटक हो रही है वह न केवल इसके लिए देश की अर्थव्यवस्था के लिए देश की आम जन के लिए अच्छे संकेत माने जाए!
             शक्तिकांत दास इंडिया के केंद्रीय रिजर्व बैंक के नए गवर्नर बने हैं, यह कोई नई बात नहीं है। नई बात तब है जब देश के केंद्रीय बैंक के गवर्नर की नियुक्ति होना विस्मय का बोध कराएं। क्या देश के केंद्रीय बैंक के गवर्नर की नियुक्ति में ऐसे व्यक्ति को गवर्नर बनाया जाना आश्चर्यजनक नहीं है जिसे अर्थव्यवस्था के बारे में कुछ भी पता न हो! देश के केंद्रीय बैंक के गवर्नर की नियुक्ति के रूप में कुर्सी पर एक ऐसे व्यक्ति को बिठाया जाना किस बात की ओर इशारा करता है? यह समझने वाली बात है । एक ऐसा व्यक्ति जिसने न कभी अर्थव्यवस्था पढ़ी, न मुद्रा का ज्ञान है, न वित्त का ज्ञान है, न बैंकिंग का ज्ञान है और न दूर दूर तक उसका इन विषयों से कोई संबंध है। ऐसे व्यक्ति को आरबीआई का गवर्नर बनाना कहां तक उचित है? क्या ऐसे व्यक्ति की नियुक्ति राजनीतिक कार्यों के लिए की गई है? सबसे बड़ा सवाल आप सभी के मन में यह उठना चाहिए कि क्या शक्ति कांत दास जो कि इतिहास में स्नातकोत्तर है उनकी नियुक्ति के बाद आरबीआई सरकार के सामने झुक जाएगी?
              अहर्क योग्यता से अलग व्यक्ति को चुना जाना निश्चित ही कई सवाल खड़े करता है। उन सवालों में यह सवाल भी महत्वपूर्ण है कि आखिर देश में ऐसी क्या स्थिति आ गई जो एक अपरंपरागत और गैर-व्यवहारिक व्यक्ति की नियुक्ति केंद्रीय रिजर्व बैंक के गवर्नर के रूप में की गई? क्या वजह रही है शक्तिकांत दास की आरबीआई गवर्नर के पद पर नियुक्ति के पीछे? शक्तिकांत दास वित्त मंत्रालय के सचिव पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। इंडिया में आरबीआई सहित अन्य उच्च संस्थानों में सेवानिवृत्त व्यक्तियों को ही नियुक्त किया जाता रहा है। अब सवाल तो यहां ये भी है कि आखिर सेवानिवृत्ति क्यों दी जाती है? सेवानिवृत्ति शायद इसलिए दी जाती है कि व्यक्ति कार्य करने में सक्षम नहीं उसे अब आराम की जरूरत है। ऐसे में सवाल यह भी उठता है कि आखिर क्या सेवानिवृत्त व्यक्तियों को उच्च पदों पर नियुक्ति आराम फरमाने के लिए दी जाती है? देश की स्थिति को देखते हुए आभास ऐसा ही हो रहा है कि सच में सेवानिवृत्त व्यक्तियों की नियुक्ति उन्हें उस पद पर रहते हुए आराम फरमाने के लिए दी जाती है ताकि कोई सजग मजबूत और अच्छा फैसला न हो सके,अच्छे निर्णय न हो सके और देश को फायदा ने पहुंच सके!
               इतिहास विषय में मास्टर डिग्री प्राप्त करने के बाद व्यक्ति इतिहास के बारे में जानकार हो सकता है लेकिन हिंदुस्तान की सरकार ने बता दिया कि न केवल इतिहास से बल्कि अर्थव्यवस्था विषय से संबंधित ज्ञान भी इतिहास विषय में मास्टर की उपाधि प्राप्त करने से हो जाता है! गनीमत है कि देश की सरकार ने इतिहास से एम ए करने के बाद किसी चिकित्सकीय पेशे में नियुक्ति नहीं दी,वरना चिकित्सा के क्षेत्र का क्या हाल होता यह कह पाना मुश्किल है। सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या अब रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया की स्वायत्तता पर कोई असर पड़ेगा? वैसे स्वायत्तता है या नहीं यह भी शोध का विषय है। ऐसे में असर किस बात का जब नियुक्तियां सरकार द्वारा अपने इच्छित व्यक्ति की जाए ऐसे में स्वायत्तता की बात करना पूर्णत बेमानी ही है।
              इस तरह की कई घटनाक्रम देश में घटित हुए हैं जिससे देश की केंद्रीय सरकार क्या संदेश देना चाहती है समझ से परे ! क्या देश की सरकार जनता को बताना चाहती है कि जनता क्या सोचती हैं इससे हमें कोई फर्क नहीं पड़ता, हम तो वही करेंगे जो हमारी इच्छा होगी! सीआईआई  के अध्यक्ष के अनुसार तय हो गया कि इंडिया में बैंकिंग तंत्र क्यों बनाया गया है। स्पष्ट है कि बैंकिंग और गैर बैंकिंग संस्थानों को कर्ज़ देने के लिए बनाया है। शक्तिकांत दास की नियुक्ति से बाजार में शरणार्थियों(उद्योगपतियों व व्यापारियों) को पैसे का प्रवाह मिलेगा। अब सबसे बड़ा सवाल इन के बयान से यही साबित होता है कि बैंकों का गठन ही शरणार्थियों को वापस नहीं लेने के लिए कर्ज देने के लिए किया गया है। जब वे कर्ज नहीं चुका पाएंगे तो उसे एनपीए जैसी विधियों के माध्यम से पूरा करके जनता से वसूला जाएगा। इंडिया में बैंकिंग एक मेकैनिज्म है जो किसान को बर्बाद करके शरणार्थियों (उद्योगपति और व्यापारी) को जीवित रखता है। यहां यह सवाल उठाना भी लाजमी है क्या देश की अर्थव्यवस्था इन्हीं शरणार्थियों के कारण चलती है? जवाब है नहीं। हमें इस ओर भी ध्यान देना चाहिए कि देश की अर्थव्यवस्था कृषि आधारित है और वह कृषि से ही चलती है। गनीमत है कि कृषि पर ध्यान न देकर सरकार ने कृषि को मजबूत ही किया है।
              इसलिए अब तय हो चुका है कि बैंकिंग सेक्टर जितनी जल्दी विधवा होगे उतनी ही जल्दी शहर विधवा और गांव व किसान आबाद होगें। अब तक गांव व किसान की बर्बादी से ही शहर व बैकिंग सेक्टर आबाद रहा हैं। इसलिए गवर्नर की नियुक्ति पर इतना बवाल नहीं होना चाहिए। आरबीआई के गवर्नर पड़ पर किस योग्यता के व्यक्ति को बैठाया जा रहा है। आज किसान और किसानियत की जो हालत है उसे सुधारने के लिए उचित विश्लेषण के लिए के बाद यह कहना सही होगा कि आरबीआई जैसी संस्था में शशिकांत दास जैसे व्यक्तियों की नियुक्ति होना अनिवार्य है। सरकार ने इसी भावना को सम्मान दिया, परिस्थिति को समझा और बैंकिंग सेक्टर जितना जल्दी विधवा हो सके उसके लिए उचित कदम उठाया है। देश का भविष्य आरबीआई के सशक्त होने से नहीं बल्कि किसान और किसानी को सशक्त करना होगा। किसान और किसानी को भावना तथा सहानुभूति की नजर से नही सुस्पष्ट आर्थिक और व्यवसायिक नजरिए से देखना होगा।  सरकार ने जाने -अनजाने में ही सही लेकिन किसान आबाद होने चाहिए, इस भावना को मजबूती के साथ आगे बढ़ाया है, इसका हमें नए केवल स्वागत करना चाहिए बल्कि जोर-शोर के साथ समर्थन भी करना चाहिए क्योंकि किसान और किसान यत बचेगी तभी अर्थव्यवस्था बचेगी । इंकलाब जिंदाबाद।
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2 comments:

  1. Great analysis by you Sir Ji on appointed RBI governorfor farmers's situation improve. But as per my view Govt. should appoint a member who have knowledge of banking and finance sector very well then country can grow very well. And for farmers govt. should take step on initative basis and policy made for farmers and provide suitable price for their crops and should control on corruption.Then economic sector and farming sector will grow with high speed.

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  2. Great analysis by you Sir Ji on appointed RBI governorfor farmers's situation improve. But as per my view Govt. should appoint a member who have knowledge of banking and finance sector very well then country can grow very well. And for farmers govt. should take step on initative basis and policy made for farmers and provide suitable price for their crops and should control on corruption.Then economic sector and farming sector will grow with high speed.

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